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सवा तीन लाख पेड़ों को काटकर बनाई झोपड़ियां

Sat, 14 Dec 2013 05:48 AM IST
Nainital
Nainital Updated Sat, 14 Dec 2013 05:48 AM IST
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हल्द्वानी। जंगल में बने गोठ, खत्ते से लेकर गौला में रहने वाले श्रमिकों ने झोपड़ियों को बनाने के लिए वनों पर जमकर आरी चलाई है। खेत बनाने को जंगल साफ किया गया है, वह अलग है। एक अनुमान के हिसाब से केवल झोपड़ियां बनाने को सवा तीन लाख छोटे-बड़े पेड़ों पर आरी चलाई गई है, इसमें शीशम, खैर, सागौन से लेकर यूकेलिप्टस को भी काटा गया है। यह स्थिति केवल तराई पूर्वी वन प्रभाग की है। यह आंकलन जंगलात का है, जिसकी रिपोर्ट जंगलात तैयार करने लगा है।
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तराई में तराई पूर्वी वन प्रभाग सबसे बड़ा है, इसमें 33 गोठ और 21 खत्ते हैं। इन खत्तों में करीब 600 परिवार रहते हैं। जंगलात से जुड़े लोगों के अनुसार एक परिवार में सदस्यों और दूसरी जरूरतों के हिसाब से चार झोपड़ियां हैं, इस तरह पूरे गोठ/खत्तों में करीब 2400 झोपड़ियां बनी हुई हैं। इन झोपड़ी को तैयार करने में भारी पैमाने पर कटान किया गया है। अधिकारियों के अनुसार एक झोपड़ी तैयार करने में करीब 15 पिलर के लिए एक फुट व्यास वाले पेड़ों को काट जाता है। इसके लिए अधिकांश जगहों पर खैर के पेड़ का सबसे ज्यादा इस्तेमाल होता है, यह लोहे के एंगल की तरह मजबूत होता है। इसके अलावा बीम के लिए सागौन, यूकेलिप्टस के पेड़ों का काटा जाता है, जो मजबूत होने के साथ सीधे होते हैं। इसके अलावा सब मिलाकर करीब 100 छोटे-बड़े पेड़ लगते हैं। ऐसे में एक झोपड़ी बनाने में ही करीब सवा सौ छोटे-बड़े पेड़ों का इस्तेमाल होता है, इसे 2400 से गुणा किया जाए तो पौने तीन लाख पेड़ों का हिसाब आता है।
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इसी तरह गौला नदी में खनन करने को बड़ी संख्या में श्रमिक बाहर से आते हैं, इस हिसाब से 29 किलोमीटर खनन और आसपास के क्षेत्र में सिर छुपाने को अस्थायी तौर पर करीब दो हजार झोपड़ियों का निर्माण होता है। इन श्रमिकों की झोपड़ी छोटी होती है, इनके लिए करीब 25 बल्लियों का इस्तेमाल होता है। इस तरह करीब छोटे-बड़े पचास हजार खास तौर पर तैयार हो रहे नए पेड़ों को काट दिया जाता है, इसमें गौला रोखड़ में मिलने वाले शीशम का इस्तेमाल ज्यादा होता है। अगर गोठ, खत्ते और खनन श्रमिकों के झोपड़ी में लगे पेड़ों को जोड़ दिया जाए, तो इनकी संख्या का हिसाब करीब सवा तीन लाख आता है। तराई पूर्वी वन प्रभाग के अधिकारी गोठ, खत्तों और श्रमिकों से पर्यावरण को पहुंच रहे नुकसान के आकलन में जुटे हैं।
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प्रभागीय वनाधिकारी डा. पराग मधुकर धकाते कहते हैं कि गोठ, खत्तों से जंगल को किस तरह से नुकसान पहुंचा है, आगे क्या चुनौतियां है आदि विभिन्न बिंदुओं पर प्रभाग एक रिपोर्ट तैयार कर रहा है, जिससे सुधार किया जा सके। जो शुरुआती जानकारी आई है, वह काफी चौंकाने वाली है।

नियम बन जाता है ढाल
हल्द्वानी। जंगलात के हिसाब से 4 इंच (व्यास) मोटाई और छह फीट ऊंचाई पर पहुंचने वाले को पेड़ माना जाता है, जबकि इससे छोटे वाले को पौधे कहते हैं, पर यह भी एक तरह से पेड़ का आकार ले चुके होते हैं, शातिर लोग अवैध कटान के आरोप से बचने को ऐसे ही पेड़ों को निशाना बनाते हैं।


दूसरे प्रभागों में भी गोठ, खत्ते
हल्द्वानी। यह आंकलन केवल एक प्रभाग का है, जबकि पश्चिमी वृत्त में रामनगर, तराई पश्चिम, केंद्रीय, हल्द्वानी आदि प्रभागों से लेकर कार्बेट टाइगर रिजर्व के अंदर तक कई गोठ, खत्ते हैं।
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