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डेढ़ दशक से आपदा की जद में
Updated Fri, 23 Jun 2017 11:07 PM IST
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एक-डेढ़ दशक से आपदा की जद में सेरी, दोबाड़, बड़ेत गांव
बागेश्वर। बागेश्वर के जिन गांवों के पुनर्वास की शासन स्तर पर कार्रवाई चल रही है वह गांव पिछले एक से डेढ़ दशक से लगातार भूस्खलन की जद में हैं। सेरी में आठ, बड़ेत में 35 और दोबाड़ में 13 परिवार गंभीर खतरे में हैं। जिले का सेरी गांव वर्ष 2002 से आपदा की जद में है। इस गांव में अधिक बारिश होने पर जमीन खिसकने से मकानों में दरारें पड़ने लगती हैं। लगातार हो रहे धंसाव के कारण कई मकान रहने लायक नहीं रह गए हैं।
क्षेत्र पंचायत सदस्य जोगा सिंह मेहता ने बताया कि भूमि धंसने से गांव के आठ परिवार खतरे में हैं। अधिक बारिश होने पर जमीन से पानी फूटने लगता है। मकानों के धंसने का खतरा पैदा हो जाता है। पूर्व में पूरे गांव को विस्थापित करने की योजना बनाई गई थी, लेकिन कुछ नहीं हुआ। बरसात में लोग डरे रहते हैं। कपकोट के दोबाड़, बड़ेत गांवों की स्थिति और भी अधिक भयावह है। दोबाड़ गांव में भूस्खलन के कारण 13 परिवार खतरे की जद में हैं। भूस्खलन से गांव के रास्ते तक ध्वस्त हो चुके हैं। ग्राम प्रधान जानकी देवी और सामाजिक कार्यकर्ता मदन सिंह ने बताया कि बरसात में सभी परिवारों का डर बढ़ जाता है। भूस्खलन का खतरा बना रहता है। उन्होंने कहा कि सुरक्षित स्थानों पर पुनर्वास होने पर गांव के सभी लोग सुख चैन से जी सकेंगे। बड़ेत गांव में पिछले सात सालों से आपदा का खतरा मंडरा रहा है। वर्ष 2010 में गांव में जबरदस्त भूस्खलन हुआ था इसमें प्राथमिक स्कूल मलबे से दब गया था। रात में घटना होने से लोग बच गए। इसके बाद 2013 में आई आपदा में मलबे से इस स्कूल की इमारत दब गई। तब से स्कूल किराए के भवन में चल रहा है। भूस्खलन के कारण स्कूल, गोचर, पनघट के रास्ते तक ध्वस्त हो गए। बारिश होने पर ग्रामीण आंखों में ही रात गुजारते हैं। यहां के 35 परिवार खतरे में जी रहे हैं। सामाजिक कार्यकर्ता गंगा सिंह कोरंगा ने बताया कि गांव के बड़ेत गांव के बुरमौला, मसराड़ी, खारबगड़, कुमुद, बड़ेतसेरा, भैयांबगढ़, लामाबगड़ तोकों के मकान अत्यधिक खतरे में हैं।
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बागेश्वर। बागेश्वर के जिन गांवों के पुनर्वास की शासन स्तर पर कार्रवाई चल रही है वह गांव पिछले एक से डेढ़ दशक से लगातार भूस्खलन की जद में हैं। सेरी में आठ, बड़ेत में 35 और दोबाड़ में 13 परिवार गंभीर खतरे में हैं। जिले का सेरी गांव वर्ष 2002 से आपदा की जद में है। इस गांव में अधिक बारिश होने पर जमीन खिसकने से मकानों में दरारें पड़ने लगती हैं। लगातार हो रहे धंसाव के कारण कई मकान रहने लायक नहीं रह गए हैं।
क्षेत्र पंचायत सदस्य जोगा सिंह मेहता ने बताया कि भूमि धंसने से गांव के आठ परिवार खतरे में हैं। अधिक बारिश होने पर जमीन से पानी फूटने लगता है। मकानों के धंसने का खतरा पैदा हो जाता है। पूर्व में पूरे गांव को विस्थापित करने की योजना बनाई गई थी, लेकिन कुछ नहीं हुआ। बरसात में लोग डरे रहते हैं। कपकोट के दोबाड़, बड़ेत गांवों की स्थिति और भी अधिक भयावह है। दोबाड़ गांव में भूस्खलन के कारण 13 परिवार खतरे की जद में हैं। भूस्खलन से गांव के रास्ते तक ध्वस्त हो चुके हैं। ग्राम प्रधान जानकी देवी और सामाजिक कार्यकर्ता मदन सिंह ने बताया कि बरसात में सभी परिवारों का डर बढ़ जाता है। भूस्खलन का खतरा बना रहता है। उन्होंने कहा कि सुरक्षित स्थानों पर पुनर्वास होने पर गांव के सभी लोग सुख चैन से जी सकेंगे। बड़ेत गांव में पिछले सात सालों से आपदा का खतरा मंडरा रहा है। वर्ष 2010 में गांव में जबरदस्त भूस्खलन हुआ था इसमें प्राथमिक स्कूल मलबे से दब गया था। रात में घटना होने से लोग बच गए। इसके बाद 2013 में आई आपदा में मलबे से इस स्कूल की इमारत दब गई। तब से स्कूल किराए के भवन में चल रहा है। भूस्खलन के कारण स्कूल, गोचर, पनघट के रास्ते तक ध्वस्त हो गए। बारिश होने पर ग्रामीण आंखों में ही रात गुजारते हैं। यहां के 35 परिवार खतरे में जी रहे हैं। सामाजिक कार्यकर्ता गंगा सिंह कोरंगा ने बताया कि गांव के बड़ेत गांव के बुरमौला, मसराड़ी, खारबगड़, कुमुद, बड़ेतसेरा, भैयांबगढ़, लामाबगड़ तोकों के मकान अत्यधिक खतरे में हैं।
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