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...तो 2050 में पहाड़ नहीं, दिखेगा रेगिस्तान!

Thu, 05 Sep 2013 04:26 AM IST
अमर उजाला, हल्द्वानी
अमर उजाला, हल्द्वानी Updated Thu, 05 Sep 2013 04:26 AM IST
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mountains will change in the desert

अगले चालीस सालों में पहाड़ों के एक हिस्से पर आपको रेगिस्तान ( शुष्क जोन या हाई एल्टीट्यूड डेजर्ड ) जैसी जगह भी दिखाई पड़ सकती है।

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ऐसा काठमांडू स्थित इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (आईसीआईएमओडी) की रिपोर्ट कहती है। यह ग्लोबल वार्मिंग का असर होगा कि कैलास पर्वत पर आने वाली पीढ़ियों को पेड़-पौधे भी दिख सकते हैं।

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ग्लोबल वार्मिंग का यह असर केवल पेड़-पौधों पर ही नहीं जीव-जंतुओं और हमारी फसलों पर भी पड़ेगा। रिपोर्ट कहती है कि पहले से संकट में चल रही फल- फूलों के लिए भी खतरा बढ़ा है।
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खत्म हो जाएंगी कई प्रजातियां
सबसे चिंता की बात यह है कि कई जंतुओं और वनस्पति की जींस भी खत्म हो सकते हैं। इससे इनका अस्तित्व ही मिट जाएगा।

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शायद ये पहली बार है कि किसी अध्ययन ने इसकी समय सीमा का ठोस अनुमान लगाने की कोशिश की है जो काफी पास भी है।

भारत-नेपाल और तिब्बत
आईसीआईएमओडी ने करीब 31 हजार वर्ग किमी में फैले कैलास को आठ जोनों में बांटकर अध्ययन किया है। इसके दायरे में तीन देश आते हैं, भारत-नेपाल और तिब्बत। भूगोल की भाषा में इसे कैलास सेक्रेड लैंडस्केप (केएसएल) भी कहा जाता है।

आठ जोनों में उत्तराखंड भी शामिल है। बारिश, बर्फबारी और तापमान के अलावा उत्तराखंड के तराई में स्थित साल वनों से लेकर देवदार के जंगल, अन्य शंकुधारी वृक्षों के जंगल, अल्पाइन झाड़ियां और बुग्यालों से लेकर ऊंचाई पर स्थित बर्फीले पर्वतों तक को अध्ययन में शामिल किया गया है। इसके लिए 1960 से लेकर अब तक के आंकड़ों को लिया गया है।

2050 में पहाडों में दिखेंगे मैदानी जीव जंतु
रिपोर्ट के मुताबिक जलवायु परिवर्तन के कारण 2050 तक ऊंचाई वाले स्थानों पर भी वह वनस्पति और जीव जंतु मिलने लगेंगे जो अब तक निचले क्षेत्र में पाए जाते हैं।

उदाहरण के लिए चौड़े पत्ते वाले उष्णकटिबंधीय जंगल, खासकर साल, शंकुवृक्ष के जंगल पहाड़ों पर उग सकते हैं। आईसीआईएमओडी की रिपोर्ट में सबसे अधिक चिंता की बात पर्वतों सर्वाधिक ठंडे स्थान के क्षेत्रफल में कमी आने की है।

2050 तक दिखने लगेगा असर
वर्तमान में ये स्थल 3469 वर्ग किमी में फैले हैं। 2050 तक इनका आकार महज 1332 वर्ग किमी रह जाएगा। जिससे पहाड़ के ठंडे इलाकों में करीब 62 प्रतिशत तक की कमी आएगी।

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यह पहाड़ में आज होने वाली वनस्पति के लिए बेहद खतरनाक होगा। भोजपत्र, ब्रह्मकमल, कुटू, पत्थी, जम्बू, गंदरायणी जैसी चीजों का अस्तित्व संकट में पड़ सकता है।


कहीं लद्दाख न बन जाए उत्तराखंड
ऐसे में ये गायब हो जाएंगी और कम ऊंचाई में होने वाले पेड़- पौधे इनकी जगह ले लेंगे। इसके अलावा रिपोर्ट में उस शुष्क जोन का भी उल्लेख है जो पहाड़ी इलाके में बनने जा रहा है। यह रेगिस्तान की तरह होगा, वैसे ही जैसा लद्दाख का क्षेत्र है। इसे तकनीकी भाषा में हाई एल्टीट्यूड डेजर्ड कहते हैं।

तेजी से पिघल रहे हैं ग्लेशियर
एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार हिमालय क्षेत्र में पिघल रहे ग्लेशियरों की रफ्तार चिंताजनक है। पिछले 50 सालों में एवरेस्ट की स्नोलाइन 180 मीटर तक कम हो गई है।

ग्लेशियरों के आकार में 13 फीसदी तक गिरावट आई है। जिस गति से बर्फ पिघल रही है उससे पानी का दबाव बढ़ता जा रहा है। इससे ग्लेशियरों में विस्फोट हो सकते हैं। हिंदूकुश हिमालय में 20 हजार से अधिक झीलें पिघलने के कारण बनी हैं। दबाव अधिक पड़ा तो झीलें फटेंगी।

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