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आपदा प्रभावितों के लिए पलायन भी मुश्किल

Tue, 06 Aug 2013 08:04 AM IST
सूरत सिंह रावत
सूरत सिंह रावत Updated Tue, 06 Aug 2013 08:04 AM IST
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migration tough because of money shortage

उफनाई असी गंगा चिंवा, घटूसौड़ और उत्तरौं आदि गांवों में कई परिवारों के घर और खेत लील गई। बेघर हुए लोगों को गोशाला और रिश्तेदारों के यहां शरण लेनी पड़ी है। न सरकार से इतनी मदद मिली और न पास में इतना पैसा है कि कहीं और जाकर बसेरा बना सके। ऐसे में ये लोग चाहते हुए भी पलायन नहीं कर सकते।

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मकान बहा ले गई
घटूसौड़ गंगोरी निवासी बचन सिंह कभी असी गंगा के किनारे 12 बडे़ खेतों में सब्जी तथा घर में दूध का उत्पादन करके पूरे परिवार की परवरिश करते थे। उनकी मौत के बाद पत्नी ने इन्हीं खेतों से सब्जी उगाकर बच्चों की परवरिश की। पिछले साल आई असी गंगा की बाढ़ उनका पैतृक तथा फौजी बेटे दिनेश का मकान बहा ले गई।
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खेती के लिए जमीन भी नहीं बची। बेटे ने तो परिवार देहरादून शिफ्ट कर दिया, किंतु वे कभी एक बेटी तो कभी दूसरी बेटी के घर रहकर जीवन गुजार रही हैं। चिंवा गांव के पूरन सिंह की भी असी गंगा के किनारे 12 नाली भूमि पर फलदार पेड़ों की नर्सरी थी, साथ ही वे सब्जी उत्पादन कर सालाना डेढ़ लाख रुपये कमा लेते थे। किंतु पिछले साल अगस्त तथा इस बार जून की बाढ़ सारी जमीन बहा ले गई।

एक लाख मुआवजे से क्या होगा
सरकार ने मकान टूटने का एक लाख मुआवजा दिया, पर इससे न घर बन सकता है और न ही रोजगार हो सकता है। यही हाल उत्तरौं के पूरन सिंह, जसपाल, उदय सिंह तथा भगवान सिंह का भी है।

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