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मेयर बनेगी महिला, पुरुष दावेदारों के सपने चकनाचूर
Updated Mon, 15 Oct 2018 10:48 PM IST
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कोटद्वार। नवसृजित नगर निगम कोटद्वार के मेयर का पद महिला सामान्य के लिए आरक्षित होने से इस पद के लिए लंबे समय से हाथ-पांव मार रहे पुरुष दावेदारों के सपने चकनाचूर हो गए हैं। नगर निगम के मेयर पद पर पहली महिला के पदासीन होने से कोटद्वार क्षेत्र की भावी राजनीति भी प्रभावित होगी।
कोटद्वार की नगर पालिका में क्षेत्र की 35 ग्राम पंचायतों के 73 गांवों को मिलाकर राज्य सरकार ने इसे उच्चीकृत करते हुए नगर निगम का दर्जा दिया है। सरकार की यह कवायद प्रशासनिक संरचना के साथ ही क्षेत्रीय राजनीतिक संरचना को भी प्रभावित करेगी। राजनीतिक हलकों में इसके कयास काफी दिनों से लगाए जा रहे थे, अब इसकी तस्वीर साफ हो चुकी है। कोटद्वार नगर पालिका अध्यक्ष की सीट वर्ष 2008 से लगातार आरक्षित चल रही है। 2008 में यह सीट सामान्य वर्ग की महिला के लिए आरक्षित थी, तब भाजपा की शशि नैनवाल ने यहां जीत दर्ज की थी। इसके बाद हुए 2013 के चुनाव में यह सीट अनुसूचित जाति महिला के लिए आरक्षित कर दी गई, तब इस सीट पर बसपा प्रत्याशी के रूप में रश्मि राणा विजयी रही। रश्मि राणा अब पाला बदलकर भाजपा में शामिल हो चुकी हैं।
अब एक बार फिर नगर निगम के मेयर का पद महिला के लिए आरक्षित हो जाने से राजनीति के जानकार हैरान हैं। सरकार के इस निर्णय से इस पद के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे कांग्रेस, भाजपा व अन्य राजनीतिक दलों के पुरुष दावेदारों की उम्मीदों को झटका लगा है। उनका मानना है कि शीर्ष राजनीतिक नेताओं ने शुरू से ही क्षेत्र में अपने वर्चस्व को बचाए रखने के लिए इस सीट को आरक्षित रखा और नगर निगम बनने के बाद भी यह सिलसिला जारी है। दरअसल ये नेता चाहते हैं कि आरक्षण की आड़ में उनके स्वार्थ भी सिद्ध होते रहें और साथ ही उन्हें चुनौती देने वाला नया नेतृत्व भी न उभर पाए। नगर निगम के मेयर की सीट आरक्षित होने से कोटद्वार क्षेत्र की महिला राजनीति भी नई करवट लेने लगी है। सत्तारूढ़ भाजपा और प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस में मेयर के लिए दावेदार देहरादून के चक्कर काटने लगे हैं।
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कोटद्वार की नगर पालिका में क्षेत्र की 35 ग्राम पंचायतों के 73 गांवों को मिलाकर राज्य सरकार ने इसे उच्चीकृत करते हुए नगर निगम का दर्जा दिया है। सरकार की यह कवायद प्रशासनिक संरचना के साथ ही क्षेत्रीय राजनीतिक संरचना को भी प्रभावित करेगी। राजनीतिक हलकों में इसके कयास काफी दिनों से लगाए जा रहे थे, अब इसकी तस्वीर साफ हो चुकी है। कोटद्वार नगर पालिका अध्यक्ष की सीट वर्ष 2008 से लगातार आरक्षित चल रही है। 2008 में यह सीट सामान्य वर्ग की महिला के लिए आरक्षित थी, तब भाजपा की शशि नैनवाल ने यहां जीत दर्ज की थी। इसके बाद हुए 2013 के चुनाव में यह सीट अनुसूचित जाति महिला के लिए आरक्षित कर दी गई, तब इस सीट पर बसपा प्रत्याशी के रूप में रश्मि राणा विजयी रही। रश्मि राणा अब पाला बदलकर भाजपा में शामिल हो चुकी हैं।
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अब एक बार फिर नगर निगम के मेयर का पद महिला के लिए आरक्षित हो जाने से राजनीति के जानकार हैरान हैं। सरकार के इस निर्णय से इस पद के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे कांग्रेस, भाजपा व अन्य राजनीतिक दलों के पुरुष दावेदारों की उम्मीदों को झटका लगा है। उनका मानना है कि शीर्ष राजनीतिक नेताओं ने शुरू से ही क्षेत्र में अपने वर्चस्व को बचाए रखने के लिए इस सीट को आरक्षित रखा और नगर निगम बनने के बाद भी यह सिलसिला जारी है। दरअसल ये नेता चाहते हैं कि आरक्षण की आड़ में उनके स्वार्थ भी सिद्ध होते रहें और साथ ही उन्हें चुनौती देने वाला नया नेतृत्व भी न उभर पाए। नगर निगम के मेयर की सीट आरक्षित होने से कोटद्वार क्षेत्र की महिला राजनीति भी नई करवट लेने लगी है। सत्तारूढ़ भाजपा और प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस में मेयर के लिए दावेदार देहरादून के चक्कर काटने लगे हैं।
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