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अतिक्रमण से पटे गदेरों ने तोड़े तटबंध, घनी आबादी में घुसा पानी
Updated Fri, 04 Aug 2017 10:48 PM IST
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कोटद्वार। शिवालिक श्रेणियों की तलहटी में बसा कोटद्वार और समूचा भाबर क्षेत्र आपदा के मुहाने पर बैठा है। पहाड़ से निकलकर कोटद्वार के मैदानी इलाके में प्रवेश करने वाली नदियों के मुहाने और दोनों किनारों पर पिछले कुछ वर्षों में हुए जबर्दस्त अतिक्रमण से नदियां बरसात में अपना तटबंध तोड़कर घनी आबादी में बहने को मजबूर हैं। कोटद्वार के लोगों ने पनियाली गदेरे से पहली बार ऐसी तबाही देखी है। हालांकि 20 साल पहले भी पनियाली गदेरा शहरवासियों को रौद्र रूप दिखा चुका है, जब मौजूदा सीएसडी कैंटीन की जगह आमपड़ाव का खुला मैदान हुआ करता था। तब इस मैदान पर लगा सर्कस भी तबाह हो गया था। उस घटना से न तो क्षेत्रवासियों ने सबक लिया और न ही तहसील प्रशासन ने।
शिवालिक श्रेणियों से होकर कोटद्वार-भाबर क्षेत्र में प्रवेश करने वाली नदियों में खोह, सुखरौ और मालन प्रमुख नदियां हैं। इसके अलावा बरसात में पलियाली, ग्वालगढ़, तेलीसोत और गिवंई सोत जैसी बरसाती नदियां अतीत से ही इस क्षेत्र में बाढ़ के रूप में कहर ढाती रही हैं। कोटद्वार भाबर की स्थापना से ही लोगों ने वर्षाकाल मेें बाढ़ से उपजी भयावहता को देख अपनी मुख्य बस्तियां इन नदियों से पर्याप्त दूरी पर स्थापित की थीं। इससे जानमाल की क्षति कम होती थी, मगर आबादी बढ़ने के साथ ही मौजूदा दौर में लोगों ने बाढ़ की अनदेखी कर खोह, सुखरौ, गिंवई, पनियाली, मालन समेत सभी नदियों के ठीक मुहाने और दोनों तटों पर बड़ी संख्या में अपने मकान, दुकान और सुरक्षा दीवार खड़ी कर दी। इससे बरसात में नदियों में बढ़े पानी का आगे निकलना मुश्किल हो गया और उसने अपने तटों को तोड़कर आसपास की आबादी पर कहर बरपाना शुरू कर दिया। बृहस्पतिवार रात कोटद्वार और कण्वाश्रम के जंगलों में बादल फटने से आई बाढ़ को ये बरसाती नदियां अपने में समा नहीं सकीं।
पनियाली गदेरे का रौद्र रूप तो कोटद्वारवासी अब से करीब 20 साल पहले भी देख चुके हैं। तब मौजूदा सीएसडी कैंटीन खुला मैदान था, जिसे आमपड़ाव के नाम से जाना जाता था। तब वहां ग्राउंड में लगी सर्कस (नुमाइश) तक बह गई थी। तब सिताबपुर में दीप टाकीज, पशु चिकित्सालय सहित दर्जनों मकान बह गए थे। इसी तरह अस्सी के दशक में सुखरौ नदी में आई भयंकर बाढ़ में सिमलचौड़ में बने भारतीय खाद्य निगम के दो गोदाम बुरी तरह धराशायी हो गए थे। आज इसी सिमलचौड़ में सरकारी मशीनरी की मिलीभगत से हुए अतिक्रमण जगजाहिर हैं।
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बृहस्पतिवार की रात आई पनियाली गदेरे की बाढ़ ने शिवपुर, आमपड़ाव, सिताबपुर, मानपुर, सूर्यनगर, काशीरामपुर, बालासौड़, ब्रहृमपुुरी से लेकर कौड़िया तक प्रभावित हुआ है। मानपुर से सीएसडी कैंटीन, सेना के एमटी कैंप में तेज बहाव के साथ घुसे मलबे ने जहां रिफ्यूजी कालोनी को अपनी चपेट में लिया, वहीं हाइडिल कालोनी में इसने बिजली घर को भी अपनी चपेट में लेते हुए रमेश नगर तक जा पहुंचा।
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शिवालिक श्रेणियों से होकर कोटद्वार-भाबर क्षेत्र में प्रवेश करने वाली नदियों में खोह, सुखरौ और मालन प्रमुख नदियां हैं। इसके अलावा बरसात में पलियाली, ग्वालगढ़, तेलीसोत और गिवंई सोत जैसी बरसाती नदियां अतीत से ही इस क्षेत्र में बाढ़ के रूप में कहर ढाती रही हैं। कोटद्वार भाबर की स्थापना से ही लोगों ने वर्षाकाल मेें बाढ़ से उपजी भयावहता को देख अपनी मुख्य बस्तियां इन नदियों से पर्याप्त दूरी पर स्थापित की थीं। इससे जानमाल की क्षति कम होती थी, मगर आबादी बढ़ने के साथ ही मौजूदा दौर में लोगों ने बाढ़ की अनदेखी कर खोह, सुखरौ, गिंवई, पनियाली, मालन समेत सभी नदियों के ठीक मुहाने और दोनों तटों पर बड़ी संख्या में अपने मकान, दुकान और सुरक्षा दीवार खड़ी कर दी। इससे बरसात में नदियों में बढ़े पानी का आगे निकलना मुश्किल हो गया और उसने अपने तटों को तोड़कर आसपास की आबादी पर कहर बरपाना शुरू कर दिया। बृहस्पतिवार रात कोटद्वार और कण्वाश्रम के जंगलों में बादल फटने से आई बाढ़ को ये बरसाती नदियां अपने में समा नहीं सकीं।
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पनियाली गदेरे का रौद्र रूप तो कोटद्वारवासी अब से करीब 20 साल पहले भी देख चुके हैं। तब मौजूदा सीएसडी कैंटीन खुला मैदान था, जिसे आमपड़ाव के नाम से जाना जाता था। तब वहां ग्राउंड में लगी सर्कस (नुमाइश) तक बह गई थी। तब सिताबपुर में दीप टाकीज, पशु चिकित्सालय सहित दर्जनों मकान बह गए थे। इसी तरह अस्सी के दशक में सुखरौ नदी में आई भयंकर बाढ़ में सिमलचौड़ में बने भारतीय खाद्य निगम के दो गोदाम बुरी तरह धराशायी हो गए थे। आज इसी सिमलचौड़ में सरकारी मशीनरी की मिलीभगत से हुए अतिक्रमण जगजाहिर हैं।
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बृहस्पतिवार की रात आई पनियाली गदेरे की बाढ़ ने शिवपुर, आमपड़ाव, सिताबपुर, मानपुर, सूर्यनगर, काशीरामपुर, बालासौड़, ब्रहृमपुुरी से लेकर कौड़िया तक प्रभावित हुआ है। मानपुर से सीएसडी कैंटीन, सेना के एमटी कैंप में तेज बहाव के साथ घुसे मलबे ने जहां रिफ्यूजी कालोनी को अपनी चपेट में लिया, वहीं हाइडिल कालोनी में इसने बिजली घर को भी अपनी चपेट में लेते हुए रमेश नगर तक जा पहुंचा।