उत्तराखंड में सुधरने के बजाय और बिगड़ रहे हालात

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वेद विलास उनियाल Published by: Updated Thu, 11 Jul 2013 08:09 AM IST
instead of improving  situation are getting worse in Uttarakhand

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पूरे दिन सड़कें बंद थीं। अगली सुबह किसी ने कहा कि गुप्तकाशी तक जा सकते हो, लेकिन रुक-रुककर। कहीं गांव के रास्तों से जाना होगा कहीं सड़क से। रोज की तरह आज आसमान बरस नहीं रहा था। बल्कि थोड़ी उमस थी।
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सब टूट रहा है
रुद्रप्रयाग के बस स्टेशन पर वाहन इस तरह हार्न मार रहे थे मानो सड़क को लेकर कोई समस्या ही नहीं हो। एक जीप में हम भी सवार हो गए। हमारे साथ केदारघाटी से एक परिचित डॉ. राकेश भट्ट भी शामिल हो गए। जीप केवल सात किमी ही चली थी कि मंजर सामने आ गया। सड़क पर चलते हुए एक वृद्ध ने पहले ही चेतावनी दे दी कहां जा रहे हो कहां तक जा पाओगे। सब टूट रहा है।


जीप ने हमें नौला पानी में छोड़ दिया। यहां थोड़ी सुविधा यह थी कि टूटे मार्ग पर कुछ चलकर हम दूसरे छोर पर चलकर दूसरा वाहन पकड़ सकते थे। दूसरे छोर पर आकर हम दूसरी जीप पकड़ते हैं और तिलवाड़ा के लिए चल पड़ते हैं।

पूरा दृश्य डरावना
तिलवाड़ा में उतरते ही सामने नजर स्कूल पर जाती है, यह स्कूल न केवल गिरा है बल्कि पूरा दृश्य डरावना लगा है। इसके नीचे सौंराखाल मार्ग को भी इसके मलबे ने ध्वस्त कर दिया है। तिलवाड़ा में कुछ देर रुककर गंगतल की तरफ रवाना होते हैं। यहां 16 व 17 जून की बाढ़ ने सड़क को काट दिया था।

बीआरओ ने नदी के समानांतर चलते हुए रोड बनाई थी। लेकिन यह सुविधा ज्यादा दिन नहीं रही। बरसात ने इसके चिथड़े उड़ा दिए। कल तक जहां पर रास्ता था वहां आज तेज वेग से नदी बह रही है। अब हमारे सामने एक ही विकल्प था कि पहाड़ी में चढ़कर दूसरे छोर पहुंचना।

एक तो खड़ी पहाड़ी दूसरा बरसात की फिसलन और ऊपर से चीड़ का पिरुल। इस पर चलना कठिन था। पर जब गांव के लोग चल ही रहे थे तो हम क्याें नहीं। रास्ते में यह भी दिखा कि एक आदमी अपने दो छोटे बच्चाें को साथ लेकर चल रहा था। उसने हमने पूछा कि कितनी दूर और जाना होगा।

आगे दिक्कत तो नहीं होगी। उन्हें क्या जबाव देते। कदम-कदम पर खतरा था। आखिर हम पहली ऊंचाई पर पहुंचे फिर उफनती मंदाकिनी पर नजर डाली। एक पल सिहर भी गए। कितनी पास बह रही है मंदाकिनी। थोड़ी सी लापरवाही जीवन का खतरा बन सकती है। उस पहाड़ी पर उतरकर दूसरी ओर पहुंचे तो थोड़ा चैन की सांस ली।

देखते ही रोने लगी

इसके बाद सड़क की कदमताल थी। करीब चार किमी चलकर हम सिल्ली पहुंच गए। सिल्ली में प्रवेश करते ही एक महिला पर नजर पड़ी। हमे देखते ही रोने लगती है। समझना काफी था कि विपदा इस पर टूटी है। वह अपने घर की ओर इशारा करती है। पानी की लहरें उसके घर को भेद रही हैं। आज नहीं तो कल इसे टूटना ही है।

उसने बताया कि गौरीकुंड में भी हमारी दुकान बह चुकी है। फिर कोई एक घर की ओर इशारा करता है कि आगे का हिस्सा तो दिखता है पर पीछे का हिस्सा गायब है। पानी की लहरों ने अजीब तमाशा किया है। यह घर विकास का है जो गांव के सदमे को नहीं झेल सका।

गांववाले अब जितना अपने खेत और मकान को याद करते हैं उससे ज्यादा विकास को याद करते हैं। अगला पड़ाव विजयनगर में है।

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कहते हैं केदारनाथ के बाद सबसे ज्यादा विनाश यही पर हुआ था। यहां बाजार का एक बड़ा हिस्सा नदी में समा गया। इसके बाद आगे जाना संभव नहीं। वही जतन करना पड़ता है। फिर पहाड़ियों पर चढ़े। जहां पहले बनियाड़ी जाने के लिए घूमकर दो किमी पैदल रास्ता था कल की बारिश से दूरी दोगुनी हो गई।

पहाड़ी इस बार कम खतरनाक थी, लेकिन बीच में देवल गदेरा भी था। इस गदेरे में पानी आए दिन बढ़ता रहता है। कब बढ़ जाए पता नहीं चलता।

जैसे-तैसे इसे पार किया। उस छोर से कुछ लोग गांव से आते हुए दिखे। ये लोग जवाहर नगर से अगस्त्यमुनि जा रहे थे। बनियाड़ी गांव में दो महिलाएं सूखे खेतों में धान की पौध रोप रही थीं। हम चौंके कि सूखे खेतों में इस तरह रोपाई। उन्होंने बताया कि नहर टूट गई है, बारिश आने की आस में पौध रोप रही हैं ताकि इनकी जिंदगी बच जाए।

कुछ आगे बढ़ते हैं एक घर के आंगन में सोलर लाइट चार्ज हो रही है, ताकि रात को घना अंधेरा होगा तो यही काम आएगा।

कई घर खाली हो गए
घरगांव कई तरह से चल रहे हैं। सब अपने जीने का जतन भी ढूंढ रहे हैं। आगे जवाहरनगर में हमारे अगस्त्यमुनि के प्रतिनिधि दीपक बेंजवाल मिले। वह बदहवासी में बताते हैं कि कल रात 11 बजे से सड़क में ही रात कट रही है। कई घर खाली हो गए हैं। उनके घर के आगे भी छह मकान भरभराकर नीचे गिर गए हैं। कई घर ऐसे दिख रहे हैं जैसे मंदाकिनी इन घरों से होते हुए निकल रही हो।

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