कुछ ऐसी होती है सामान्य से संन्यासी बनने की कठिन डगर
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कुंभ और अनेक धार्मिक पर्वों के दौरान हजारों संन्यासी दिखाई देते हैं। लेकिन आत्मज्ञान के इस मार्ग पर चलना कोई आसान काम नहीं है। एक सामान्य इंसान से संन्यासी बनने का रास्ता बेहद कठिन तप से होकर जाता है, जिसे पार करना हर किसी के बस की बात नहीं हैं। आइए जानते हैं संन्यासी बनने के लिए क्या-क्या करना पड़ता है...
संन्यासी बनने के लिए पांच चरणों में दीक्षा दी जाती है।
पहला चरणः
पहले चरण में शिष्य पांच गुरुओं से दीक्षा लेता है। जब गुरु द्वारा शिष्य पहली शिक्षा प्राप्त करता है तो वह आम इंसान से संन्यासी बन जाता है। इन पांच गुरुओं के कार्य भी अलग-अलग होते हैं। पहला गुरु शिष्य की चोटी कटवाता है। दूसरा गुरु शिष्य को भगवा वस्त्र धारण कराता है। तीसरा गुरु शिष्य को रुद्राक्ष की माला पहनाता है। चौथा गुरु शिष्य को लंगोट पहनाता है और पांचवा गुरु शिष्य को भस्म लगाकर उसे संन्यासी बनाता है।
दूसरा चरणः
दूसरे चरण में विर्जा हवन की दीक्षा दी जाती है, जिसके लिए संन्यासी का मुंडन किया जाता है। उसके बाद जनेऊ धारण कर वह नदी के तट पर जाता है। जहां उसे विर्जा हवन दीक्षा दी जाती है। इस दीक्षा में उसे अपने माता-पिता, भाई-बहन, पत्नी, बच्चों व परिजनों आदी का पिंडदान करना होता है। इसके बाद संन्यास में उसका दूसरा जन्म होता है। यह दीक्षा उज्जैन सिंहस्थ, हरिद्वार, इलाहाबाद, नासिक कुंभ में दी जाती है।
आगे और कठिन होते जाते हैं ये दीक्षा चरण
तीसरा चरणः
इस चरण में धूनी तपन संस्कार किया जाता है। इस क्रिया से पहले रात में धूनी जलाई जाती है और भजन किए जाते हैं। फिर सुबह आचार्य महामंडलेश्वर संन्यासी को बुलाते हैं और मंत्रोच्चारण के साथ उसे नया नाम दिया जाता है।
चौथा चरणः
इस दीक्षा में संन्यासी को दिगंबर बनने की दीक्षा दी जाती है। यह दीक्षा धर्म ध्वजा के नीचे दी जाती है। जिसके बाद शिष्य दिगंबर साधु के रूप में जाता है।
पांचवा चरणः
इस दीक्षा में शिष्य अखाड़े को गुरु दक्षिणा देता है जिसके बाद अखाड़े द्वारा उसकी पुकार लगाई जाती है। इसके बाद उसे श्री दिगंबर साधु के नाम से बुलाया जाता है। इस दीक्षा में वह 12 माह तक नागा के रूप में रह सकता है। दीक्षा लेने के बाद न वह पलंग पर सो सकता है और न ही सिले हुए कपड़े पहन सकता है। इसके बाद संन्यासी भगवान शिव की तरह पूजा जाने लगता है।