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...जब 'पत्रकार' बन गया लखिया भूत!
अमर उजाला, पिथौरागढ़
Updated Fri, 06 Sep 2013 11:41 PM IST
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उत्साह और रोमांच के बीच कुमौड़ गांव का प्रसिद्ध हिलजात्रा उत्सव शुक्रवार देर शाम संपन्न हो गया। रस्सियों से जकड़े लखिया भूत के हिलजात्रा मैदान में पहुंचते ही वहां रौंगटे खड़ा करने वाला दृश्य पैदा हो गया।
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हजारों लोग इस अद्भुत लोक परंपरा के गवाह बने। हिलजात्रा का आयोजन पिछले दो सौ सालों से होता आ रहा है। हिलजात्रा पर्व की तैयारी कुमौड़ गांव में एक सप्ताह पहले से शुरू हो गई थी।
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80 हजार आबादी
शुक्रवार को दोपहर बाद करीब 80 हजार आबादी वाले पिथौरागढ़ नगर के लोगों का रुख कुमौड़ गांव की ओर था। देखते ही देखते कुमौड़ के ऐतिहासिक मैदान लोगों से खचाखच भर गया। हजारों लोग लोग घरों की छतों में जमा हो गए।
तस्वीरों में देखें...एक था लखिया भूत
शाम करीब साढ़े छह बजे से उत्सव शुरू हुई। कुमौड़ के ऐतिहासिक कोट (किले) से सबसे पहले रोपाई करने वाली महिलाओं का दल मैदान में उतरा।
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बड़ी-बड़ी रस्सियों से बांधा
उसके बाद गलिया बल्द (आलसी बैल) की जोड़ी लाई गई। काफी देर तक यह कार्यक्रम चला। शाम सवा छह बजे ढोल-नगाड़ों के बीच जैसे ही लखिया भूत को मैदान में लाया गया तो लोगों के रौंगटे खड़े हो गए।
बच्चे इधर-उधर भागने की कोशिश करने लगे। लखिया भूत को नियंत्रित करने के लिए उसे बड़ी-बड़ी रस्सियों से बांधा गया था। लखियाभूत की भूमिका इस बार भी पत्रकार यशवंत महर ने निभाई।
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विशेष प्रकार का मुखौटा
वह विशेष प्रकार का मुखौटा पहने हुए थे। बताया जाता है कि यह मुखौटा महर राजपूतों के वंशज नेपाल से जीतकर लाए थे। मान्यता है कि लखियाभूत जितना आक्रामक है, प्रसन्न होने पर उतना ही फलदायी भी होता है।
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हजारों की तादाद में मौजूद महिलाओं तथा पुरुषों ने लखियाभूत का आशीर्वाद लिया। यह कार्यक्रम करीब दो घंटे चला।
क्या है मान्यता
विश्वास है कि इस तरह की उपासना तथा आयोजन से लखियाभूत प्रसन्न हो जाते हैं। इससे गांव तथा इलाके में किसी प्रकार की विपदा नहीं आती, फसल बेहतर होती है, सूखे का प्रकोप नहीं होता।
नेपाल में होती है इंद्रजात
पिथौरागढ़। नेपाल की राजधानी काठमांडू में हिलजात्रा की तर्ज पर इंद्रजात नाम से राष्ट्रीय पर्व मनाया जाता है। नेपाली उत्सवों के जानकार महेश चंद्र बराल बताते हैं कि इस बार नेपाल में इंद्रजात 18 सितंबर को होगी।