{"_id":"62a9f3fe39e38128144d41cd","slug":"we-are-ashamed-the-termite-licking-your-glory-haridwar-news-drn4146344191","type":"story","status":"publish","title_hn":"गुनमानी में श्री सत्यज्ञान निकेतन, लाइब्रेरी खंडहर में दफन","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
गुनमानी में श्री सत्यज्ञान निकेतन, लाइब्रेरी खंडहर में दफन
विज्ञापन
बदहाल पड़ा श्री सत्यज्ञान निकेतन ।
- फोटो : HARIDWAR
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
हिंदी का गौरव रहा श्री सत्यज्ञान निकेतन वक्त के साथ दुर्गति का शिकार हो गया है। हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए करीब 82 साल पहले यहां बनाई गई लाइब्रेरी खंडहर में तब्दील हो चुकी है। इस ऐतिहासिक लाइब्रेरी के दरवाजों और खिड़कियों को दीमक निगल गई है। अलमारियों में किताबों और पांडुलिपियों की जगह कबाड़ ने ले ली है। लाइब्रेरी का बरामदा खाली गमलों और कबाड़ से भरा हुआ है।
श्री सत्यज्ञान निकेतन, नागरी प्रचारिणी ट्रस्ट काशी के अधीन है। ट्रस्ट की अनदेेखी से श्री सत्यज्ञान निकेतन अब हिंदी प्रेमियों की यादों में सिमटकर रह गया है। इसके मुख्य प्रवेश द्वार और लाइब्रेरी की दीवारों पर उकेरी मीरा बाई और सूरदास की काव्य पंक्तियां इसके सुनहरे अतीत की गवाह हैं। हिंदी प्रचारक स्वामी सत्यदेव परिब्राजक ने 1940 में आर्यनगर चौक पर करीब 10 बीघा भूमि ली थी। इसके लिए उन्होंने अपनी हिंदी की पुस्तकें बेची थीं। हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए उन्होंने यहां श्री सत्यज्ञान निकेतन नाम से लाइब्रेरी की नींव रखी। उन्होंने 30 नवंबर 1943 को हिंदी की प्रमुख संस्था नागरी प्रचारिणी ट्रस्ट काशी को यह भूमि और लाइब्रेरी दान कर दी थी। इसका उल्लेख प्रवेश द्वार पर लगे शिलापट्ट पर भी दर्ज है। ट्रस्ट के अधीन होने के बाद से श्री सत्यज्ञान निकेतन के बुरे दिन शुरू हो गए।
दरअसल, ट्रस्ट ने बेशकीमती संपत्ति को करीब चार दशक पूर्व मैनेजर सर्वजीत मिश्रा के हवाले छोड़ दिया था। ट्रस्ट ने सर्वजीत मिश्रा के अलावा तीन परिवारों को करीब तीन दशक पहले यहां रहने की जगह दी, ताकि परिसर की साफ-सफाई और लाइब्रेरी का रखरखाव हो सके। लेकिन हुआ इसके विपरीत।
विज्ञापन
2019 को मैनेजर सर्वजीत मिश्रा का निधन हो गया था। इसी साल मार्च में लाइब्रेरी में आग भी लग गई थी। आग कैसे लगी और किसने लगाई इसकी कोई पुष्ट जानकारी नहीं है। लाइब्रेरी में जिस वक्त आग लगी वहां कांवड और कबाड़ भरा था। जर्जर हो चुका लाइब्रेरी भवन आग लगने से और बदहाल हो गया। हालांकि, दीवारों पर उकेरे गए दोहे आज भी लाइब्रेरी के सुनहरे अतीत को बयां करते हैं।
सर्वजीत मिश्रा के निधन के बाद अब परिसर की देखरेख उनका बेटा प्रभाकर मिश्रा करता है। प्रभाकर मिश्रा लोक निर्माण विभाग में काम करता है। श्री सत्यज्ञान निकेतन में इस वक्त कुल नौ परिवार रहते हैं। इनमें मनोज और खेमकरण यहां नर्सरी चलाते हैं और दोनों रिश्तेदार हैं। जबकि बाकी परिवारों में कोई ई-रिक्शा चलाता है तो काई मजदूरी करता है। श्री सत्यज्ञान निकेतन की लाइब्रेरी में टूटे गमले और कबाड़ भरा है। बरामदे में नर्सरी में बेचे जाने वाले गमले रखे हैं। 10 बीघा परिसर में कहीं आम और लीची का मिश्रित बाग है तो कहीं नर्सरी की पौधशालाएं। कई झोपड़ियां भी हैं और जगह-जगह कबाड़ के ढेर लगे हैं।
2019 से नहीं आया ट्रस्ट का कोई सदस्य
नर्सरी वाले प्रभाकर मिश्रा को सात हजार रुपये सालाना किराया देते हैं। तीन दशक पहले परिसर की साफ सफाई के लिए बसाए गए तीन परिवार 10 रुपये मासिक किराए पर हैं। यह भी उन्होंने सालों से नहीं दिया। पांच अन्य परिवार भी कुछ सालों से परिसर में किराए पर रह रहे हैं। नागरी प्रचारिणी ट्रस्ट काशी का कोई भी सदस्य 2019 के बाद से यहां नहीं आया। प्रभाकर मिश्रा बताते हैं ट्रस्ट के कुसुमाकर पांडे से उनकी फोन पर बातचीत होती है। 2019 के बाद से किराये के संबंध में ट्रस्ट से कोई लेनदेना भी नहीं हुआ है। प्रभाकर मिश्रा बताते हैं दोनों नर्सरी 20 साल से चल रही हैं।
नेताओं से लेकर भूमाफिया की नजर
निकेतन की 10 बीघा भूमि पर नेताओं से लेकर भूमाफिया की नजर है। प्रभाकर मिश्रा बताते हैं कि संपत्ति पर कब्जे के नियत से कुछ लोग कई बार हमला कर चुके हैं। कुछ लोगों ने अदालत में संपत्ति पर अपने हक की दावेदारी भी की।
विज्ञापन
श्री सत्यज्ञान निकेतन, नागरी प्रचारिणी ट्रस्ट काशी के अधीन है। ट्रस्ट की अनदेेखी से श्री सत्यज्ञान निकेतन अब हिंदी प्रेमियों की यादों में सिमटकर रह गया है। इसके मुख्य प्रवेश द्वार और लाइब्रेरी की दीवारों पर उकेरी मीरा बाई और सूरदास की काव्य पंक्तियां इसके सुनहरे अतीत की गवाह हैं। हिंदी प्रचारक स्वामी सत्यदेव परिब्राजक ने 1940 में आर्यनगर चौक पर करीब 10 बीघा भूमि ली थी। इसके लिए उन्होंने अपनी हिंदी की पुस्तकें बेची थीं। हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए उन्होंने यहां श्री सत्यज्ञान निकेतन नाम से लाइब्रेरी की नींव रखी। उन्होंने 30 नवंबर 1943 को हिंदी की प्रमुख संस्था नागरी प्रचारिणी ट्रस्ट काशी को यह भूमि और लाइब्रेरी दान कर दी थी। इसका उल्लेख प्रवेश द्वार पर लगे शिलापट्ट पर भी दर्ज है। ट्रस्ट के अधीन होने के बाद से श्री सत्यज्ञान निकेतन के बुरे दिन शुरू हो गए।
विज्ञापन
दरअसल, ट्रस्ट ने बेशकीमती संपत्ति को करीब चार दशक पूर्व मैनेजर सर्वजीत मिश्रा के हवाले छोड़ दिया था। ट्रस्ट ने सर्वजीत मिश्रा के अलावा तीन परिवारों को करीब तीन दशक पहले यहां रहने की जगह दी, ताकि परिसर की साफ-सफाई और लाइब्रेरी का रखरखाव हो सके। लेकिन हुआ इसके विपरीत।
विज्ञापन
2019 को मैनेजर सर्वजीत मिश्रा का निधन हो गया था। इसी साल मार्च में लाइब्रेरी में आग भी लग गई थी। आग कैसे लगी और किसने लगाई इसकी कोई पुष्ट जानकारी नहीं है। लाइब्रेरी में जिस वक्त आग लगी वहां कांवड और कबाड़ भरा था। जर्जर हो चुका लाइब्रेरी भवन आग लगने से और बदहाल हो गया। हालांकि, दीवारों पर उकेरे गए दोहे आज भी लाइब्रेरी के सुनहरे अतीत को बयां करते हैं।
सर्वजीत मिश्रा के निधन के बाद अब परिसर की देखरेख उनका बेटा प्रभाकर मिश्रा करता है। प्रभाकर मिश्रा लोक निर्माण विभाग में काम करता है। श्री सत्यज्ञान निकेतन में इस वक्त कुल नौ परिवार रहते हैं। इनमें मनोज और खेमकरण यहां नर्सरी चलाते हैं और दोनों रिश्तेदार हैं। जबकि बाकी परिवारों में कोई ई-रिक्शा चलाता है तो काई मजदूरी करता है। श्री सत्यज्ञान निकेतन की लाइब्रेरी में टूटे गमले और कबाड़ भरा है। बरामदे में नर्सरी में बेचे जाने वाले गमले रखे हैं। 10 बीघा परिसर में कहीं आम और लीची का मिश्रित बाग है तो कहीं नर्सरी की पौधशालाएं। कई झोपड़ियां भी हैं और जगह-जगह कबाड़ के ढेर लगे हैं।
2019 से नहीं आया ट्रस्ट का कोई सदस्य
नर्सरी वाले प्रभाकर मिश्रा को सात हजार रुपये सालाना किराया देते हैं। तीन दशक पहले परिसर की साफ सफाई के लिए बसाए गए तीन परिवार 10 रुपये मासिक किराए पर हैं। यह भी उन्होंने सालों से नहीं दिया। पांच अन्य परिवार भी कुछ सालों से परिसर में किराए पर रह रहे हैं। नागरी प्रचारिणी ट्रस्ट काशी का कोई भी सदस्य 2019 के बाद से यहां नहीं आया। प्रभाकर मिश्रा बताते हैं ट्रस्ट के कुसुमाकर पांडे से उनकी फोन पर बातचीत होती है। 2019 के बाद से किराये के संबंध में ट्रस्ट से कोई लेनदेना भी नहीं हुआ है। प्रभाकर मिश्रा बताते हैं दोनों नर्सरी 20 साल से चल रही हैं।
नेताओं से लेकर भूमाफिया की नजर
निकेतन की 10 बीघा भूमि पर नेताओं से लेकर भूमाफिया की नजर है। प्रभाकर मिश्रा बताते हैं कि संपत्ति पर कब्जे के नियत से कुछ लोग कई बार हमला कर चुके हैं। कुछ लोगों ने अदालत में संपत्ति पर अपने हक की दावेदारी भी की।