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अब और उलझ गया शंकराचार्य पीठों का विवाद
hridwar uttrakhanda india
Updated Sat, 25 Feb 2017 12:06 AM IST
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शंकराचार्य पीठों का विवाद एक और शंकराचार्य के अभिषेक के बाद कुछ और गहरा गया है। शास्त्रार्थ की दिग्विजय यात्रा के बिना ही अब शंकराचार्य बना दिए जाते हैं। बदलते दौर में संतों ने खुद दर्जनों पीठ स्थापित कर जगद्गुरु शंकराचार्य नाम अपने साथ जोड़ लिया है। यह सब शंकर मठाम्नाय और पीठ अनुशासन के विरुद्ध है।
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आद्य जगद्गुरु शंकराचार्य ने धरती पर उपलब्ध सभी शास्त्रों में पारंगत होने के उपरांत शास्त्रार्थ करते हुए दिग्विजय यात्रा निकाली थी। दक्षिण से पूरब, पश्चिम होते हुए वे उत्तर पहुंचे। जहां जहां भी विद्वान थे, उन सभी को शास्त्रार्थ करके परास्त किया। शंकर मठाम्नाय में आदि जगद्गुरु ने स्पष्ट लिखा है कि शंकराचार्य पद पर वही आसीन होगा, जो विद्वत परिषद को शास्त्रार्थ में पराजित करेगा। यदि एक भी प्रश्न अनुत्तरित रह गया तो कोई पद का अधिकारी नहीं बन सकता। स्वयं आदि जगद्गुरु मंडन मिश्र की अध्यक्षता वाली काशी विश्व परिषद को परास्त करने के बाद तब शंकराचार्य पद से वंचित हो गए जब मंडन मिश्र की अर्द्धांगिनी के रूप में मां शारदा ने शंकर को चुनौती दी। उन्होंने कहा कि वे अपने पति का आधा भाग हैं और जब तक शंकर उन्हें परास्त नहीं करते, विजय नहीं मानी जाएगी। शारदा द्वारा गृहस्थ धर्म के बारे में पूछे गए सवालों का शंकर जवाब नहीं दे पाए। तब उन्होंने छह महीने का समय मांगा और परकाया प्रवेश कर गृहस्थ का ज्ञान हासिल किया। बाद में पुन: काशी जाकर शारदा को भी परास्त किया। तब कहीं शंकर जगद्गुरु शंकराचार्य के पद पर आसीन हो पाए।
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आदि जगद्गुरु द्वारा रचित शंकर मठाम्नाय में स्पष्ट व्यवस्था दी गई है कि अपनी पीठ के क्षेत्र में शास्त्रार्थ के माध्यम से योग्यता स्थापित किए बगैर कोई भी संत शंकराचार्य पद पर आसीन नहीं हो सकता। उन्होंने उत्तर में ज्योर्ति पीठ, दक्षिण में श्रृंगेरी, पूर्व में गोवर्धन पीठ और पश्चिम में शारदा पीठ की स्थापना की थी। दशनाम संन्यासियों से कौन संत किस पीठ पर आसीन हो सकता है, इसका भी उल्लेख मठाम्नाय में किया गया है। पिछले करीब चार दशकों से परंपराओं का विघटन प्रारंभ हो गया। जैसे जैसे संत जगत का विस्तार होता गया, वैसे वैसे अनेक शंकराचार्य पीठ बढ़ती चली गई। इस समय करीब 22 पीठों पर शंकराचार्य बैठाए गए हैं। ये सब आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित परंपराओं के विरुद्ध हैं। अब तो उनके द्वारा स्थापित तीन पीठों पर भी कई कई शंकराचार्य समान पद पर आसीन हो गए हैं।
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