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खुद को अमर कर गया जांबाज प्रमोद
ब्यूूराो/ अमर उजाला, हरिद्वार
Updated Mon, 18 Apr 2016 12:34 AM IST
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गंगा में डूबे किश्ााोर काो ढूंढती पुलिस।
- फोटो : अमर उजाला
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हरिद्वार। जिंदगी से हर किसी को बेइंतहा प्यार होता है। इसलिए मौत का नाम सुनकर बड़ाें-बड़ों के चेहरे की हवाईयां उड़ जाती है। लेकिन अपने परिवार के युवा मुखिया 22 वर्षीय प्रमोद सिंह रावत ने अपनी जान देकर इस बात को झूठा साबित कर दिया है।
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अपनी जान पर खेलकर उसने चचेरे भाई को नया जीवन तो दिया ही उसकी कोशिश अजय व विजय को भी मौत के मुंह से खींच लाने का था। लेकिन नियति को यह मंजूर नहीं था। वह उन दोनों भाईयों को तो बचा नहीं पाया बल्कि खुद मौत के आगोश में समा गया। खैर, अपनी जान देकर प्रमोद ने गांव के इतिहास में खुद को अमर कर दिया। हर किसी की जुबां पर उसकी जांबाजी की चर्चा है।
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नौकरी पेशा प्रमोद सिंह रावत के पिता वीरेंद्र सिंह रावत की एक वर्ष पहले करंट लगने से मौत हो गई थी। उसके बाद से परिवार की जिम्मेदारी उसके ऊपर थी। एक प्राईवेट कंपनी में कार्यरत प्रमोद दो दिन पहले ही घर आया था।
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रविवार को वह अपने दो चचेरे भाईयों और दो अन्य किशोरों के साथ गंगा तट पर नहाने गया था। लेकिन जब यह चारों किशोर गंगा में डूबने लगे तो इन्हें बचाने गंगा में कूद गया। दिलेर प्रमोद ने चचेरे भाई अंकित को बचा लिया। लेकिन अन्य को बचाने के चक्कर में वह खुद भी डूब गया। हर कोई ग्रामीण उसकी दिलेरी को सलाम कर रहा है। वह अपने पीछे बड़ी बहन भारती, जुड़वा भाई ऋषि-मुनि (13 वर्ष) और मां को रोता बिलखता छोड़ गया है। प्रमोद के परिवार का लालन पालन अब कैसे होगा। यह सवाल अब हर किसी के दिमाग में कौंध रहा है।
खौफनाक मंजर याद कर सिहर उठता है अंकित
हरिद्वार। मौत से साक्षात्कार कर चुके 11 वर्षीय अंकित की जुबां से बोल ही नहीं फूट रहे हैं। बदहवास अवस्था में अंकित रह-रह कर बस दहाड़े मार कर रोने लगता है। उसकी आंखों के सामने अब भी वह ही खौफनाक मंजर दौड़ रहा है। जिसे छूकर वह लौटा है। डरा सहमा मासूम किसी से बात तक नहीं कर रहा है। रिश्तेदार, ग्रामीण एवं परिजन उसे संभालने की कोशिश में जुटे हैं। लेकिन मानो वह सुध-बुध खो बैठा है। बार-बार अपने बड़े भाई अजय रावत से मिलने की बात कह रहा है। कभी विजय चौहान और अजय चौहान के बारे में पूछने लगता है।
एक के पिता सेना में, दूसरे के प्राइवेट नौकरी पेशा
हरिद्वार। दुनिया को अलविदा कह चुके विजय, अजय चौहान के पिता भजन सिंह चौहान जल सेना में कार्यरत है। अंकित एवं अजय रावत के पिता ज्वालापुर में एक फर्नीचर्स की दुकान में कार्यरत हैं। अजय और विजय का एक बड़ा भाई अनमोल है। जबकि अजय एवं अंकित दो भाई थे। अजय रावत आठवीं का छात्र है और अजय चौहान छठीं एवं विजय चौथी का छात्र था।
जिसने भी सुना गंगा तट पर दौड़ा चला आया
हरिद्वार। दिल दहला देने वाली इस घटना के बारे में जिसने भी सुना एक बारगी उसे यकीन नहीं हुआ। फिर सीधे गंगा तट की और दौड़ पड़ा। देखते ही देखते पूरा गांव तट पर उतर आया। गंगा तट परिजनों की चित्कार से गूंज उठा। अन्य ग्रामीणों का भी यही हाल था। हर कोई एक-दूसरे को संभालने में जुटा रहा। काले रविवार को शायद ही श्यामपुर गांव अब कभी भूला पाए। यहां तीन परिवारों को ताउम्र सालने वाला जख्म मिला है। मिश्रित आबादी वाले इस गांव में आपस में बेहद प्रेम प्यार है। यहां हर कोई मिल-जुलकर रहता है। पूरे गांव की महिलाएं पीड़ित परिवारों को ढांढस बंधाने में जुटी रही।
पीड़ित को संभालने में जुटे ग्रामीणों की आंखें भर आई
हरिद्वार। हायरे, मेरे लाल कहां चला गया। एक बार लौटकर आ जा, मैं अब कैसे जीऊंगी। तू कहां चला गया। क्यों गया था आज गंगा जी। भगवान क्या यह दिन देखने के लिए औलाद की खुशी दी थी।
रविवार को यह बोल अपने-अपने लाडलों को खो चुकी हर मां के मुंह से फूटते रहे। उन्हें देखकर गांववालों का भी कलेजा मुंह की ओर आया। हर किसी की आंख से अश्रुधारा थमने का नाम नहीं ले रही थी। अपने लाडले अजय रावत के गंगा में समा जाने की बात पता चलते ही मां सतेश्वरी ने भी जिंदगी जीने की आस छोड़ आत्महत्या करनी चाही। लेकिन समय रहते उसे बचा लिया गया। बार-बार वह यह ही बोलती रही कि उसे भी अब जीना नहीं है। अजय को वापस लेकर आओ। दूसरी ओर घर के दोनों चिराग खो चुके दादा बचन सिंह, दादी एवं मां होश खो चुके थे। प्रमोद के घर में भी कोहराम मचा हुआ था।