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जहां पहले था हाथियों का कॉरीडोर, वहां आज आबादी का शोर

Fri, 10 Dec 2021 10:57 PM IST
Dehradun Bureau देहरादून ब्यूरो
Updated Fri, 10 Dec 2021 10:57 PM IST
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Health services and vaccination affected
रानीमाजरा गांव की और से जाते हाथी । - फोटो : HARIDWAR
जंगली हाथियों के स्वभाव में बदलाव के लिए काफी हद तक उनके स्वच्छंद विचरण में बाधाएं खड़ी होना भी है। यही कारण है कि पिछले कुछ वर्षों में वन्य जीव और मानव का संघर्ष बढ़ा है। हाथियों के कॉरिडोर में बस्तियां आबाद हो गई। यहां कंक्रीट के जंगल खड़े होने के बाद हाथी अपने पारंपरिक कॉरिडोर से गुजरने की कोशिश करते हैं और आबादी में घुस जाते हैं।
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राजाजी टाइगर रिजर्व का जंगल धर्मनगरी की आबादी से सटा हुआ है। ग्रामीण क्षेत्र भी वन प्रभाग के जंगल से लगा हुआ है। हाथी जंगल से निकलकर आबादी की तरफ रुख कर रहे हैं। कुंभ में हाथियों के उत्पात को रोकने के लिए करोड़ों रुपये से सोलर फेंसिंग, सुरक्षा दीवार और अन्य कार्य किए गए थे। जरूरी उपकरणों के साथ अतिरिक्त फोर्स लगाई गई थी। अब हाथी फिर से आबादी क्षेत्र में दस्तक देने लगे। इससे आम लोगों के साथ वन कर्मचारियों की नींद उड़ी हुई है। पिछले कई दिनों से तो हाथी कनखल के मातृ सदन के पास से रिहायशी इलाके में आ रहे। उजाला होने के बाद भी हाथी यहां विचरण करते रहते हैं। जानकारों का कहना है कि जहां से हाथी जंगल से खेतों की तरफ जाते हैं, वह कभी जंगल था और उनका पुराना कॉरिडोर। हाथियों का झुंड आज आज इसी कॉरिडोर से गुजरने की कोशिश करते हैं। अब यहां कॉलोनियां आबाद हो गई हैं। संवाद
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कभी कार्बेट से राजाजी तक करते थे विचरण
जानकारी के अनुसार करीब चार दशक पहले तक हाथी कार्बेट पार्क से राजाजी टाइगर रिजर्व के जंगलों तक विचरण करते थे। तब हाथी लालढांग के जंगलों से श्यामपुर, चिड़ियापुर, बिशनपुर से होकर पथरी के जंगलों तक पहुंचते थे। बताया जाता है कि इसके बाद हाथियों का झुंड भेल, रोशनाबाद से होते हुए वापस कार्बेट पार्क में चले जाते थे। रोशनाबाद और भेल भी पूर्व में राजाजी का जंगल हुआ करता था। भेल, विकास भवन और सिडकुल बनने के बाद जंगल खत्म हो गए। अब तो यहां कई कॉलोनियां आबाद हो गई हैं।
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हस्तिनापुर तक भी जाते थे हाथी
हरिद्वार वन प्रभाग की श्यामपुर रेंज में नजीबाबाद हाईवे के तिरछे पुल के कॉरिडोर से हाथी गंगा पार करते हुए पथरी क्षेत्र में पहुंचते हैं। यहां से अजीतपुर, मिस्सरपुर और लक्सर से होते हुए हस्तीनापुर मेरठ के जंगलों तक जाते थे। अब यहां गांव के गांव आबाद हो गए हैं। हाथी आज भी जंगलों से निकलकर इन गांवों तक जाते हैं और फसलों को चट करने के बाद लौट आते हैं।
टिहरी विस्थापित क्षेत्र था जंगल
पथरी क्षेत्र के जंगलों में टिहरी बांध प्रभावित हजारों परिवारों को बसाया गया। यहां विस्थापितों के कई गांव हैं। यह पूरा इलाका कभी जंगल होता था और यहां हाथी विचरण करते थे।
गंगा को पार करके आते हैं कनखल
बिशनपुर, पुरानी कुंडी गांव के सामने हाथियों का कॉरिडोर हुआ करता था। यहां से वह गंगा की मुख्य धारा को पार करके आते थे। बताया जाता है कि यहां से हाथी रात में आते थे और सुबह होने से पहले ही लौट जाते थे। मातृ सदन के सामने जंगल से निकल हाथी पहले गंगा की मुख्य धारा और बाद में छोटी धारा को पार करते हुए आवागमन करते थे। बताया जाता है कि यहां पहले घना जंगल हुआ करता था। अब यहां आबादी बस गई है।

हाथियों के जो पुराने कॉरिडोर हैं, उनको चिह्नित किया जाएगा। हाथी अब उन स्थानों पर न आएं, उसके लिए योजना बनाकर काम किया जाएगा। - डीएस मीणा, डीएफओ, हरिद्वार
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