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डेढ़ करोड़ र्ख्च, तीन करोड़ आए कांवडिये
ब्यूरो अमर उजाला ब्यूरो हरिद्वार
Updated Tue, 02 Aug 2016 11:49 PM IST
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डेढ़ करोड़ र्ख्च, तीन करोड़ आए कांवडिये
बेहतर प्रबंधन से काम किए जाएं तो वह बिना किसी विघ्न के संपन्न हो सकता है। ऐसा इस बार कांवड़ मेले के कुशल संचालन से समझा जा सकता है। प्रशासन के दावों पर यकीन करें तो इस बार कांवड मेले में करीब साढ़े तीन करोड़ कांवड़िये हरिद्वार पहुंचे और पूरे मेले को सकुशल संपन्न कराने में खर्च किया गया केवल एक करोड़ चालीस लाख रुपये। इससे कुंभ और अर्द्धकुंभ जैसे महा आयोजनों में होने वाली पैसे की बंदरबाट का अंदाजा लगाया जा सकता है।
कुंभ और अर्द्धकुंभ मेलों में राज्य तथा केंद्र सरकारें भारी भरकम बजट खर्च करती हैं। अरबों रुपया खर्च करके व्यवस्थाएं जुटाई जाती हैं। बावजूद इसके कहीं न कहीं वित्तीय एवं प्रशासनिक व्यवस्थाओं पर सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में केवल डेढ़ करोड़ में कांवड मेला संपन्न कराना हवा के सुखद झौंके की तरह है।
हरिद्वार में कुंभ तथा अर्द्धकुंभ जैसे विशाल आयोजन होते हैं। पिछला कुंभ वर्ष 2010 में हुआ था। तक एक हजार करोड़ से भी ज्यादा बजट खर्च किया गया। इसी साल जनवरी से अप्रैल तक हुए अर्द्धकुंभ में केंद्र सरकार की ओर से कंजूसी के बाद भी राज्य सरकार ने करीब 400 करोड़ रुपये खर्च किए। इतनी भारी भरकम राशि खर्च करने के बाद भी कुल मिलाकर इतने यात्री नहीं आए जितने सोमवार को खत्म हुए 14 दिन के कांवड़ मेले में गंगाजल लेने पहुंचे।
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बजट के हिसाब से देखा जाए तो कांवड़ मेला बहुत कम बजट में ही संपन्न हो गया। इस बार प्रशासन ने दो अलग-अलग चरणों में कांवड़ मेले के लिए बजट जारी किया। पहले चरण मं कांवड़ पटरी दुरुस्त करने और अन्य सुविधाएं जुटाने के लिए 40 लाख तथा बाद में अन्य व्यवस्थाओं के लिए 90 लाख रुपये जारी किए गए। स्थायी प्रकृति के कामों को छोड़ दिया जाए तो कांवड़ में अन्य सारी व्यवस्थाएं जुटाई भी गई। जिलाधिकारी हरबंस सिंह चुघ ने बताया कि कांवड़ मेले में सभी विभागों के अधिकारियों के सहयोग से बेहतर वित्तीय प्रबंधन कर कम बजट मं ज्यादा सुविधाएं जुटाने का प्रयास किया गया। सभी विभगों ने जितने बजट की मांग की थी उसमें कटौती कर उन्हें प्राथमिकता वाले कार्यों के अनुरूप बजट जारी किया गया, जिससे बेहतर परिणम पाने में सफलता मिली।
बेहतर प्रबंधन से काम किए जाएं तो वह बिना किसी विघ्न के संपन्न हो सकता है। ऐसा इस बार कांवड़ मेले के कुशल संचालन से समझा जा सकता है। प्रशासन के दावों पर यकीन करें तो इस बार कांवड मेले में करीब साढ़े तीन करोड़ कांवड़िये हरिद्वार पहुंचे और पूरे मेले को सकुशल संपन्न कराने में खर्च किया गया केवल एक करोड़ चालीस लाख रुपये। इससे कुंभ और अर्द्धकुंभ जैसे महा आयोजनों में होने वाली पैसे की बंदरबाट का अंदाजा लगाया जा सकता है।
कुंभ और अर्द्धकुंभ मेलों में राज्य तथा केंद्र सरकारें भारी भरकम बजट खर्च करती हैं। अरबों रुपया खर्च करके व्यवस्थाएं जुटाई जाती हैं। बावजूद इसके कहीं न कहीं वित्तीय एवं प्रशासनिक व्यवस्थाओं पर सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में केवल डेढ़ करोड़ में कांवड मेला संपन्न कराना हवा के सुखद झौंके की तरह है।
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हरिद्वार में कुंभ तथा अर्द्धकुंभ जैसे विशाल आयोजन होते हैं। पिछला कुंभ वर्ष 2010 में हुआ था। तक एक हजार करोड़ से भी ज्यादा बजट खर्च किया गया। इसी साल जनवरी से अप्रैल तक हुए अर्द्धकुंभ में केंद्र सरकार की ओर से कंजूसी के बाद भी राज्य सरकार ने करीब 400 करोड़ रुपये खर्च किए। इतनी भारी भरकम राशि खर्च करने के बाद भी कुल मिलाकर इतने यात्री नहीं आए जितने सोमवार को खत्म हुए 14 दिन के कांवड़ मेले में गंगाजल लेने पहुंचे।
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बजट के हिसाब से देखा जाए तो कांवड़ मेला बहुत कम बजट में ही संपन्न हो गया। इस बार प्रशासन ने दो अलग-अलग चरणों में कांवड़ मेले के लिए बजट जारी किया। पहले चरण मं कांवड़ पटरी दुरुस्त करने और अन्य सुविधाएं जुटाने के लिए 40 लाख तथा बाद में अन्य व्यवस्थाओं के लिए 90 लाख रुपये जारी किए गए। स्थायी प्रकृति के कामों को छोड़ दिया जाए तो कांवड़ में अन्य सारी व्यवस्थाएं जुटाई भी गई। जिलाधिकारी हरबंस सिंह चुघ ने बताया कि कांवड़ मेले में सभी विभागों के अधिकारियों के सहयोग से बेहतर वित्तीय प्रबंधन कर कम बजट मं ज्यादा सुविधाएं जुटाने का प्रयास किया गया। सभी विभगों ने जितने बजट की मांग की थी उसमें कटौती कर उन्हें प्राथमिकता वाले कार्यों के अनुरूप बजट जारी किया गया, जिससे बेहतर परिणम पाने में सफलता मिली।