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बलिदान देकर भी नहीं ठिठके मातृसदन के कदम
अमर उजाला ब्यूरो हरिद्वार
Updated Fri, 26 May 2017 10:35 PM IST
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मातृसदन करीब दो दशक से गंगा रक्षा के लिए संघर्ष कर रहा है। इस दौरान उसने एक युवा संत का बलिदान भी दिया। इस दौरान कई बार सरकारें मातृसदन के आगे झुकती भी नजर आई। ब्रह्मचारी निगमानंद का बलिदान देकर भी मातृसदन के कदम नहीं ठिठके। अनशन (तप) की लंबी श्रृंखला में बुधवार को एक नया अध्याय जुड़ा । एक बार खुद परमाध्यक्ष स्वामी शिवानंद फिर से अनशन पर बैठ गए हैं।
हरिद्वार में गाय, गंगा और गायत्री का झंडा उठाने वाले राजनीतिक और सामाजिक संगठनों की फेहरिस्त काफी लंबी है। धरातल पर काम करने वाले चुनिंदा ही नजर आते हैं। संतों की नगरी में गंगा रक्षा का जिक्र होने पर मातृसदन का नाम सरकारों और संस्थाओं में सबसे ऊपर आता है। कुंभ क्षेत्र को खनन व क्रशिंग से मुक्त कराने के लिए मातृसदन ने तीन मार्च वर्ष 1998 को गंगा रक्षा अभियान की शुरूआत की। इसके बाद तो जैसे आंदोलनों का इतिहास ही बनता चला गया। मातृसदन के संतों को जेल भी भेजा गया इसके बाद भी अनशन जारी रहा। प्रदेश की राजधानी देहरादून से लेकर नई दिल्ली जंतर मंतर तक आंदोलन किया। गंगा का चीरहरण करने वाले राजनेताओं, अधिकारियों और खनन माफिया के गठजोड़ को उजागर करने में भी मातृसदन ने कोई कसर नहीं छोड़ी।
कई बार सरकार और माफिया ने दबाव बनाने की नाकाम कोशिश की, जानलेवा हमले का डर दिखाकर कदम डिगाने के तमाम प्रयास हुए, लेकिन स्वामी शिवानंद ने गंगा रक्षा का संकल्प नहीं छोड़ा। आंदोलनों की कड़ी में वर्ष 2011 में एक ऐसा मोड़ भी आया, जब मातृसदन को अपने एक संत का बलिदान देना पड़ा। 68 दिनअनशन करते हुए स्वामी निगमानंद सरस्वती ने गंगा रक्षा के महायज्ञ में अपने प्राणों की आहुति दे दी। अलबत्ता मातृसदन अपने लक्ष्य से डिगा नहीं।
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मातृसदन के इन संतों ने किया तप
वर्ष 1998 से लेकर अभी तक मातृसदन के परमाध्यक्ष स्वामी शिवानंद, स्वामी गोकुलानंद सरस्वती, स्वामी निखिलानंद सरस्वती, ब्रह्मचारी दिव्यानंद, ब्रह्मचारी मनोहर दास, ब्रह्मचारी नरेशानंद, स्वामी गुणानंद सरस्वती, स्वामी सच्चिदानंद, निगमानंद सरस्वती, ब्रह्मचारी दयानंद, ब्रह्मचारी यजनानंद, स्वामी पूर्णानंद, स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद, ब्रह्मचारी आत्मबोधानंद ने समय समय पर तप किया।
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कानूनी लड़ाई में महारथ हासिल
गंगा रक्षा के लिए जहां भी कानूनी अड़चनें आती गई, उन्हें दूर करने के लिए मातृसदन ने कानून लड़ाई का सहारा भी लिया। शासन-प्रशासन व स्थानीय अदालतों से लेकर हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट और केंद्रीय मंत्रालयों में मातृसदन के संतों ने खुद ही कानूनी पैरवी की। इसके लिए कानून की किताबों का अध्ययन भी मातृसदन के स्वामी शिवानंद ने खुद अपने शिष्यों को कराया। साधारण से दिखने वाले मातृसदन के ब्रह्मचारियों ने कई बार सर्वोच्च अदालत में देश के वरिष्ठ अधिवक्ताओं को कड़ी चुनौती दी।
एनडी ने निभाया वादा, खंडूरी रहे बेदाग
वर्ष 1998 में अविभाजित उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री रामप्रकाश गुप्ता से लेकर उत्तराखंड के मौजूदा सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत तक लगभग हर मुख्यमंत्री के कार्यकाल में मातृसदन का आंदोलन चला और प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी से लेकर हरीश रावत, भगत सिंह कोश्यारी, रमेश पोखरियाल निशंक, विजय बहुगुणा और त्रिवेन्द्र सिंह रावत सीधे सीधे मातृसदन के निशाने पर भी रहे। यह भी सत्य है कि करीब हर सीएम ने मातृसदन के आंदोलन का संज्ञान भी लिया। हरीश रावत तो खुद चलकर मातृसदन पहुंचे। गंगा रक्षा के लिए मातृसदन की मांगों को पूरा करने का वादा भी लगभग सभी ने किया, पर अपने कहे पर चुनिंदा राजनेता ही खरे उतर पाए। स्वामी शिवानंद बताते हैं कि सिर्फ नारायण दत्त तिवारी और दिल्ली भाजपा के एक नेता ने ही अपना वादा निभाया। भुवन चंद्र खंडूरी के समय में नेता, अफसर, माफिया का गठजोड़ नहीं हुआ। बाकी लगभग सभी ने वादा कर धोखा दिया।
हरिद्वार में गाय, गंगा और गायत्री का झंडा उठाने वाले राजनीतिक और सामाजिक संगठनों की फेहरिस्त काफी लंबी है। धरातल पर काम करने वाले चुनिंदा ही नजर आते हैं। संतों की नगरी में गंगा रक्षा का जिक्र होने पर मातृसदन का नाम सरकारों और संस्थाओं में सबसे ऊपर आता है। कुंभ क्षेत्र को खनन व क्रशिंग से मुक्त कराने के लिए मातृसदन ने तीन मार्च वर्ष 1998 को गंगा रक्षा अभियान की शुरूआत की। इसके बाद तो जैसे आंदोलनों का इतिहास ही बनता चला गया। मातृसदन के संतों को जेल भी भेजा गया इसके बाद भी अनशन जारी रहा। प्रदेश की राजधानी देहरादून से लेकर नई दिल्ली जंतर मंतर तक आंदोलन किया। गंगा का चीरहरण करने वाले राजनेताओं, अधिकारियों और खनन माफिया के गठजोड़ को उजागर करने में भी मातृसदन ने कोई कसर नहीं छोड़ी।
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कई बार सरकार और माफिया ने दबाव बनाने की नाकाम कोशिश की, जानलेवा हमले का डर दिखाकर कदम डिगाने के तमाम प्रयास हुए, लेकिन स्वामी शिवानंद ने गंगा रक्षा का संकल्प नहीं छोड़ा। आंदोलनों की कड़ी में वर्ष 2011 में एक ऐसा मोड़ भी आया, जब मातृसदन को अपने एक संत का बलिदान देना पड़ा। 68 दिनअनशन करते हुए स्वामी निगमानंद सरस्वती ने गंगा रक्षा के महायज्ञ में अपने प्राणों की आहुति दे दी। अलबत्ता मातृसदन अपने लक्ष्य से डिगा नहीं।
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मातृसदन के इन संतों ने किया तप
वर्ष 1998 से लेकर अभी तक मातृसदन के परमाध्यक्ष स्वामी शिवानंद, स्वामी गोकुलानंद सरस्वती, स्वामी निखिलानंद सरस्वती, ब्रह्मचारी दिव्यानंद, ब्रह्मचारी मनोहर दास, ब्रह्मचारी नरेशानंद, स्वामी गुणानंद सरस्वती, स्वामी सच्चिदानंद, निगमानंद सरस्वती, ब्रह्मचारी दयानंद, ब्रह्मचारी यजनानंद, स्वामी पूर्णानंद, स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद, ब्रह्मचारी आत्मबोधानंद ने समय समय पर तप किया।
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कानूनी लड़ाई में महारथ हासिल
गंगा रक्षा के लिए जहां भी कानूनी अड़चनें आती गई, उन्हें दूर करने के लिए मातृसदन ने कानून लड़ाई का सहारा भी लिया। शासन-प्रशासन व स्थानीय अदालतों से लेकर हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट और केंद्रीय मंत्रालयों में मातृसदन के संतों ने खुद ही कानूनी पैरवी की। इसके लिए कानून की किताबों का अध्ययन भी मातृसदन के स्वामी शिवानंद ने खुद अपने शिष्यों को कराया। साधारण से दिखने वाले मातृसदन के ब्रह्मचारियों ने कई बार सर्वोच्च अदालत में देश के वरिष्ठ अधिवक्ताओं को कड़ी चुनौती दी।
एनडी ने निभाया वादा, खंडूरी रहे बेदाग
वर्ष 1998 में अविभाजित उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री रामप्रकाश गुप्ता से लेकर उत्तराखंड के मौजूदा सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत तक लगभग हर मुख्यमंत्री के कार्यकाल में मातृसदन का आंदोलन चला और प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी से लेकर हरीश रावत, भगत सिंह कोश्यारी, रमेश पोखरियाल निशंक, विजय बहुगुणा और त्रिवेन्द्र सिंह रावत सीधे सीधे मातृसदन के निशाने पर भी रहे। यह भी सत्य है कि करीब हर सीएम ने मातृसदन के आंदोलन का संज्ञान भी लिया। हरीश रावत तो खुद चलकर मातृसदन पहुंचे। गंगा रक्षा के लिए मातृसदन की मांगों को पूरा करने का वादा भी लगभग सभी ने किया, पर अपने कहे पर चुनिंदा राजनेता ही खरे उतर पाए। स्वामी शिवानंद बताते हैं कि सिर्फ नारायण दत्त तिवारी और दिल्ली भाजपा के एक नेता ने ही अपना वादा निभाया। भुवन चंद्र खंडूरी के समय में नेता, अफसर, माफिया का गठजोड़ नहीं हुआ। बाकी लगभग सभी ने वादा कर धोखा दिया।