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गुरू शिष्य परम्परा को बाबा ने बढ़ाया आगे
Updated Sun, 25 Mar 2018 11:51 PM IST
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हरिद्वार।
जिस गंगा तट पर योगगुरु बाबा रामदेव 23 वर्ष पूर्व स्वयं संन्यासी बने थे, उसी तट पर बाबा ने रविवार को पतंजलि योग परंपरा के वाहकों की पहली खेप को संन्यास दीक्षा दी। बाबा का असली उत्तराधिकारी कौन है, इसका पता तो 2050 के बाद तब लगेगा, जब कुल एक हजार दीक्षित संन्यासी बाबा के सामने कर्म क्षेत्र में खड़े होंगे। तब तक उत्तराधिकारियों के रूप में वे सभी संन्यासी काम करते रहेंगे, जो संन्यास परंपरा में दीक्षित होते जाएंगे।
बाबा रामदेव ने रविवार को हरकी पैड़ी के सामने गंगा तट पर 92 युवाओं को भगवा संन्यासी वस्त्र पहनाए। इस नगरी में हर कुंभ पर हजारों नागाओं को दीक्षित किया जाता है। भगवाधारी हजारों वैष्णव भी वैराग्य की दीक्षा लेते हैं। रविवार के दीक्षिता समारोह में युवकों के साथ-साथ युवतियों को भी पहली बार दीक्षा प्रदान की गई। अभी तक संन्यासी जगत में बहुत कम दीक्षित हुई हैं और उनकी दीक्षा के कार्यक्रम भी पुरुषों से अलग हुए हैं। गंगा तट ने पहली बार स्त्री और पुरुषों को एक साथ भगवा पहनते देखा। गुरू मंत्र देकर योगगुरु ने पूर्व निर्धारित धारणा को बदलते हुए कहा कि वे सभी दीक्षित पतंजलि योग परंपरा के वाहक होंगे। यही नहीं यह क्रम 2050 तक चलता रहेगा। समय-समय पर युवाओं को दीक्षित किया जाएगा। जब पूरे एक हजार संन्यासी पतंजलि की परंपरा में निष्णात हो चुके होंगे, तब किसी एक का चयन उत्तराधिकारी के रूप में किया जाएगा।
रामकिशन से रामदेव बनने तक के पीछे एक लंबी गाथा रही है। 25 वर्ष पूर्व जब हिमालय में आचार्य बालकृष्ण के साथ तप करने के उपरांत हरिद्वार की कनखल नगरी आए थे, तब बडे़ उदासीन अखाड़े ने उन्हें अपने पास रखा था। योग और आयुर्वेद असाधारण प्रतिभा देखकर कनखल के कृपालुु बाग आश्रम में गुरु शंकर देव महाराज ने बाबा रामदेव को 23 वर्ष पूर्व भगवा पहनाकर संन्यास परंपरा में दीक्षित किया था। वह वर्ष 1995 का वर्ष था। तब से गहन अध्ययन और योग क्रांति के माध्यम से बाबा ने ऐसा संसार रचा कि आज योग को अंतरराष्ट्रीय दर्जा मिल चुका है। अब महर्षि पतंजलि और ऋषियों की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए बाबा रामदेव ने गंगा के तट पर नव संन्यासियों को दीक्षा प्रदान की है। अध्यात्म की इस नगरी से एक नये युग का सूत्रपात हुआ है।
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जिस गंगा तट पर योगगुरु बाबा रामदेव 23 वर्ष पूर्व स्वयं संन्यासी बने थे, उसी तट पर बाबा ने रविवार को पतंजलि योग परंपरा के वाहकों की पहली खेप को संन्यास दीक्षा दी। बाबा का असली उत्तराधिकारी कौन है, इसका पता तो 2050 के बाद तब लगेगा, जब कुल एक हजार दीक्षित संन्यासी बाबा के सामने कर्म क्षेत्र में खड़े होंगे। तब तक उत्तराधिकारियों के रूप में वे सभी संन्यासी काम करते रहेंगे, जो संन्यास परंपरा में दीक्षित होते जाएंगे।
बाबा रामदेव ने रविवार को हरकी पैड़ी के सामने गंगा तट पर 92 युवाओं को भगवा संन्यासी वस्त्र पहनाए। इस नगरी में हर कुंभ पर हजारों नागाओं को दीक्षित किया जाता है। भगवाधारी हजारों वैष्णव भी वैराग्य की दीक्षा लेते हैं। रविवार के दीक्षिता समारोह में युवकों के साथ-साथ युवतियों को भी पहली बार दीक्षा प्रदान की गई। अभी तक संन्यासी जगत में बहुत कम दीक्षित हुई हैं और उनकी दीक्षा के कार्यक्रम भी पुरुषों से अलग हुए हैं। गंगा तट ने पहली बार स्त्री और पुरुषों को एक साथ भगवा पहनते देखा। गुरू मंत्र देकर योगगुरु ने पूर्व निर्धारित धारणा को बदलते हुए कहा कि वे सभी दीक्षित पतंजलि योग परंपरा के वाहक होंगे। यही नहीं यह क्रम 2050 तक चलता रहेगा। समय-समय पर युवाओं को दीक्षित किया जाएगा। जब पूरे एक हजार संन्यासी पतंजलि की परंपरा में निष्णात हो चुके होंगे, तब किसी एक का चयन उत्तराधिकारी के रूप में किया जाएगा।
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रामकिशन से रामदेव बनने तक के पीछे एक लंबी गाथा रही है। 25 वर्ष पूर्व जब हिमालय में आचार्य बालकृष्ण के साथ तप करने के उपरांत हरिद्वार की कनखल नगरी आए थे, तब बडे़ उदासीन अखाड़े ने उन्हें अपने पास रखा था। योग और आयुर्वेद असाधारण प्रतिभा देखकर कनखल के कृपालुु बाग आश्रम में गुरु शंकर देव महाराज ने बाबा रामदेव को 23 वर्ष पूर्व भगवा पहनाकर संन्यास परंपरा में दीक्षित किया था। वह वर्ष 1995 का वर्ष था। तब से गहन अध्ययन और योग क्रांति के माध्यम से बाबा ने ऐसा संसार रचा कि आज योग को अंतरराष्ट्रीय दर्जा मिल चुका है। अब महर्षि पतंजलि और ऋषियों की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए बाबा रामदेव ने गंगा के तट पर नव संन्यासियों को दीक्षा प्रदान की है। अध्यात्म की इस नगरी से एक नये युग का सूत्रपात हुआ है।
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