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महाशिवरात्रि पर शिव और शक्ति का मिलन
Updated Tue, 06 Feb 2018 10:56 PM IST
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अमर उजाला ब्यूरो
हरिद्वार।
कांवड़ यात्रा शुरू हुए छह दिन बीतने के बाद भी अब तक कांवड़ियों की संख्या काफी कम है। गंगाजल तेरह व चौदह फरवरी को दो दिन चढ़ने से कांवड़ियों की भीड़ दो दिन बंट जाएगी।
पहले मुख्य कांवड़ मेला फागुन में लगता था। तब सावन में बहुत कम श्रृद्धालु जल भरा करते थे। करीब बीस वर्षों से यह सब उलट गया है। अब तो मुख्य कांवड़ यात्रा सावन मास की हो गई है, जबकि भगवान शिव के मिलन की रात्रि फागुन में पड़ती है। सावन के महीने में शिवरात्रि नहीं अपितु शिव चौदस का जल चढ़ाया जाता है। वह यात्रा भगवान परशुराम ने प्रारंभ की थी। इसके विपरीत फागुन की यात्रा तब से चल रही है, जबसे इसी कनखल में शिव का मिलन दक्ष पुत्री सती से हुआ था। कालांतर में शिव का मिलन फिर से सती के दूसरे जन्म में हिमाचल कन्या पार्वती के साथ हुआ। पार्वती ने तपस्या के बाद शिव को हरिद्वार के उस नील पर्वत पर पाया था, जहां समुद्र मंथन का विषपान करने के बाद भोलेनाथ विष की गर्मी शांत कर रहे थे। जिस स्थान पर शिव व पार्वती का मिलन हुआ वह स्थान गौरी-शंकर तथा जहां पार्वती ने तप किया, वह स्थल गौरी कुंड के रूप में विख्यात है। कांवड़ यात्रा के दिनों में श्रृद्धालु दोनों स्थानों पर दर्शन करने पहुंचते है।
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कांवड़ यात्रा अब करीब एक सप्ताह की शेष रह गई है। अभी तक गंगा पार नील धारा के किनारे से होते हुए पूर्वी उत्तर प्रदेश के श्रृद्धालु लौट रहे हैं। ये कांवड़िए रोडी मैदान में विश्राम करते हैं, तथा आमतौर पर वहीं से जल भर कर लौट जाते हैं। इस समय कांवड़ की अधिकांश लौट चंडी घाट के रास्ते नजीबाबाद होते हुए हो रही है। बुधवार से यह यात्रा हरिद्वार दिल्ली मार्ग पर भी चलने के आसार हैं। मंगलवार को दिल्ली तथा राजस्थान के कुछ भागों से कांवड़ियों का आगमन हुआ। अभी तक पंजाब व हरियाणा से कोई कांवड़िया धर्मनगरी नहीं पहुंचा है। अनुमान है कि बुधवार से यह आगमन शुरू हो जाएगा। डाक कांवड़ दस फरवरी से चलने लगेगी, अलबत्ता दूर के कांवड़िए उसके पहले भी वाहनों में जल भरने आएंगे।
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