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शिक्षा के कारण भारत को माना गया विश्व गुरु: डॉ. सुरेंद्र कुमार
Updated Sat, 10 Mar 2018 12:05 AM IST
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हरिद्वार।
गुरुकुुल कांगड़ी विवि के कुलपति डा. सुरेंद्र कुमार ने कहा कि भारत को विश्व गुरु शिक्षा के कारण ही माना गया। शिक्षा के माध्यम से अरब और यूरोप देशों में हमारे देश की शिक्षा का विशेष महत्व था। यूरोप का छात्र भारत में आकर पढ़ता था, उसे विदेश में विशेष प्राथमिकता दी जाती थी।
गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के वनस्पति एवं सूक्ष्म जीव विज्ञान विभाग में आण्विक व सूक्ष्म जैवकीय तकनीकी विषय पर आयोजित दो दिवसीय कार्यशाला में मुख्य अतिथि कुलपति डा. सुरेंद्र कुमार ने कहा कि दुनिया के प्राचीनतम विश्वविद्यालय तक्षशीला, नालंदा और विक्रमशिला को गिना जाता है। उन्होंने कहा कि इस प्रयोगशाला में संस्कृति और संस्कार की बात अवश्य होनी चाहिए। हमारे वेदों में एकाणु, द्विवाणु और त्रिवाणु का उल्लेख मिलता है।
जीव विज्ञान संकाय के संकायाध्यक्ष प्रो. आरसी दुबे ने कहा कि ऋग्वेद के 17.1 के अध्याय में ऋषि मुनियों ने वनस्पतियों को मरूत कहा गया है। उर्वरा शक्ति से वनस्पतियों को एक ऊर्जा मिलती है। कालांतर में बहुत से ऐसे बीज होते है जो बहुत जल्द ही उर्वरा शक्ति के रूप में पैदा नहीं होते। विज्ञान के रूप में अब शोध उस दिशा में किए जा रहे है जिसका सीधा लाभ आम आदमी को मिल सके।
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वनस्पति एवं सूक्ष्म जीव विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष व वरिष्ठतम वैज्ञानिक प्रो. डीके माहेश्वरी ने कहा कि विभाग में सौ से अधिक पीएचडी हो चुकी हैं, 350 से अधिक स्नातकोत्तर व 600 से अधिक शोध पत्रों का प्रकाशन विभाग के अध्यापक और शोध छात्रों द्वारा हो चुका है। विभाग के वैज्ञानिक प्रो. नवनीत ने कहा कि कार्यशाला से शोधार्थी और विद्यार्थियों के अंदर एक नवीन कला का प्रादुर्भाव होता है। दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. वीपी सिंह ने कहा कि सूक्ष्म जीवाणु पृथ्वी से लेकर अंतरिक्ष तक इस सारे ब्रह्मांड को सुरक्षित करते हैं। आगरा विश्वविद्यालय के प्रो.अशोक अग्रवाल ने कहा कि मनुष्य के शरीर पर पाए जाने वाले फंगस को प्रयोगात्मक रूप से पहचानकर विस्तारपूर्वक जानकारी दी। , इस अवसर पर डॉ. हेमेन्द्र, महाप्रबंधक, प्रो. नवनीत, प्रो. पदमा सिंह, डा. वरिंदर वाहला, डा. संजय कुमार, डा. कार्तिकेय, डा. विनीत विश्नोई, डा. श्रीवर्धन धीमान आदि मौजूद थे।
गुरुकुुल कांगड़ी विवि के कुलपति डा. सुरेंद्र कुमार ने कहा कि भारत को विश्व गुरु शिक्षा के कारण ही माना गया। शिक्षा के माध्यम से अरब और यूरोप देशों में हमारे देश की शिक्षा का विशेष महत्व था। यूरोप का छात्र भारत में आकर पढ़ता था, उसे विदेश में विशेष प्राथमिकता दी जाती थी।
गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के वनस्पति एवं सूक्ष्म जीव विज्ञान विभाग में आण्विक व सूक्ष्म जैवकीय तकनीकी विषय पर आयोजित दो दिवसीय कार्यशाला में मुख्य अतिथि कुलपति डा. सुरेंद्र कुमार ने कहा कि दुनिया के प्राचीनतम विश्वविद्यालय तक्षशीला, नालंदा और विक्रमशिला को गिना जाता है। उन्होंने कहा कि इस प्रयोगशाला में संस्कृति और संस्कार की बात अवश्य होनी चाहिए। हमारे वेदों में एकाणु, द्विवाणु और त्रिवाणु का उल्लेख मिलता है।
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जीव विज्ञान संकाय के संकायाध्यक्ष प्रो. आरसी दुबे ने कहा कि ऋग्वेद के 17.1 के अध्याय में ऋषि मुनियों ने वनस्पतियों को मरूत कहा गया है। उर्वरा शक्ति से वनस्पतियों को एक ऊर्जा मिलती है। कालांतर में बहुत से ऐसे बीज होते है जो बहुत जल्द ही उर्वरा शक्ति के रूप में पैदा नहीं होते। विज्ञान के रूप में अब शोध उस दिशा में किए जा रहे है जिसका सीधा लाभ आम आदमी को मिल सके।
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वनस्पति एवं सूक्ष्म जीव विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष व वरिष्ठतम वैज्ञानिक प्रो. डीके माहेश्वरी ने कहा कि विभाग में सौ से अधिक पीएचडी हो चुकी हैं, 350 से अधिक स्नातकोत्तर व 600 से अधिक शोध पत्रों का प्रकाशन विभाग के अध्यापक और शोध छात्रों द्वारा हो चुका है। विभाग के वैज्ञानिक प्रो. नवनीत ने कहा कि कार्यशाला से शोधार्थी और विद्यार्थियों के अंदर एक नवीन कला का प्रादुर्भाव होता है। दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. वीपी सिंह ने कहा कि सूक्ष्म जीवाणु पृथ्वी से लेकर अंतरिक्ष तक इस सारे ब्रह्मांड को सुरक्षित करते हैं। आगरा विश्वविद्यालय के प्रो.अशोक अग्रवाल ने कहा कि मनुष्य के शरीर पर पाए जाने वाले फंगस को प्रयोगात्मक रूप से पहचानकर विस्तारपूर्वक जानकारी दी। , इस अवसर पर डॉ. हेमेन्द्र, महाप्रबंधक, प्रो. नवनीत, प्रो. पदमा सिंह, डा. वरिंदर वाहला, डा. संजय कुमार, डा. कार्तिकेय, डा. विनीत विश्नोई, डा. श्रीवर्धन धीमान आदि मौजूद थे।