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जनपद में 24
Updated Mon, 26 Mar 2018 10:35 PM IST
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जोगेंद्र मावी
हरिद्वार।
देश के सबसे कुपोषित 504 जनपदों में 253वां स्थान रखने वाले हरिद्वार जिले को कुपोषण से मुक्त करने के लिए जिला प्रशासन ने पहल की है। जनपद में पांच वर्ष तक के 39.1 फीसदी बच्चे कुपोषण का शिकार पाए गए हैं। बच्चों में पोषण के स्तर पर यह चौंकाने वाली तस्वीर नीति आयोग की सर्वे रिपोर्ट में सामने आई है। बच्चों के वजन के आधार पर उन के पोषण का स्तर निकाला गया और इसकी तुलना विभिन्न आयु के अनुसार आदर्श वजन से की गई।
सर्वे में आए आंकड़ोे ने जिला प्रशासन के कान खड़े कर दिए। ऐसे में प्रशासन ने जनपद के कुपोषित बच्चों को केंद्र में भर्ती करके भरपूर खुराक देने का फैसला लिया है। जिलाधिकारी ने बच्चों को खुराक देने के साथ उनकी तीमारदारी करने वाले अभिभावकों को मजदूरी देने के लिए दो लाख रुपये का बजट जारी किया है। संबंधित बच्चों को इलाज देने के लिए प्रक्रिया शुरू कराने के दिशा निर्देश जारी किए गए हैं।
हरिद्वार जनपद में 248 बच्चे अति कुपोषित हैं। इन बच्चों को पोषण पुष्टाहार केंद्र से नियत खुराक संबंधित आंगनबाड़ी केंद्र से दी जाती है। अब जिलाधिकारी को मिली रिपोर्ट के अनुसार आंगनबाड़ी केंद्र से मिल रही खुराक से कुपोषित बच्चों के स्वास्थ्य में कोई सुधार नहीं हो पा रहा है। जिसे जिलाधिकारी दीपक रावत ने गंभीरता से लिया है। इन बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार कराने के साथ इलाज के लिए नई पहल शुरू की गई है। इन कुपोषित बच्चों को मेला अस्पताल परिसर में बने पोषण पुष्टाहार केंद्र में भर्ती करके खुराक देने के साथ-साथ उनका इलाज किया जाएगा। साथ ही इन बच्चों की तीमारदारी के लिए आए अभिभावकों को भी 100 रुपये प्रतिदिन की मजदूरी नगद दी जाएगी। इसके लिए जिलाधिकारी दीपक रावत ने दो लाख रुपये का बजट जारी कर दिया है। उन्होंने बताया कि कुपोषित बच्चों के इलाज में लापरवाही पर संबंधित अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई होगी।
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बड़ा सवाल: बिना डाक्टर के कैसे होगा इलाज
मेला अस्पताल में सन 2012 में बने पोषण पुष्टाहार केंद्र को स्थायी डाक्टर नहीं मिल सका है। जिला अस्पताल के डा. संदीप निगम के सहयोग से केंद्र में बच्चों का जैसे-तैसे उपचार किया जाता है। अब उनके महिला अस्पताल में तबादला होने के बाद से स्थिति विकट हो गई है।
जनपद में बच्चों के कुपोषित होने पर इनके इलाज के लिए पोषण पुष्टाहार केंद्र खोला गया। कुपोषित बच्चे डायरिया, निमोनिया, बुखार आदि की बीमारी से अधिक पीड़ित होते हैं। इन बच्चों को अलग केंद्र में इलाज के साथ तीमारदार करने वाले अभिभावक को दैनिक मजदूरी देने का प्रावधान किया गया। इस केंद्र के लिए जिला अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ डा. संदीप निगम को जिम्मेदारी सौंपी थी। अब उनका महिला अस्पताल में तबादला होने पर नवजात बच्चों की देखरेख करने से उन्हें कम समय मिल पाता है। इसका ही नतीजा है कि केंद्र में इस समय मात्र एक बच्चा भर्ती है।
पूर्व सीएम हरीश रावत की पहल रह गई अधूरी
अगस्त 2016 में तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत ने भेल के सभागार में खिलती कलियां योजना का उद्घाटन करते हुए हर बच्चे को पूर्ण पोषण देने की घोषणा की थी। कहा था कि कुपोषित बच्चों को पूर्ण पोषण देने के लिए जनपद में राजनीतिक दल, सामाजिक संस्थाएं एवं अधिकारी दो-दो बच्चों को गोद लेंगे एवं उनकी मोनीटरिंग करेंगे। लेकिन उनकी कवायद केवल भाषण में ही रह गई थी।
हरिद्वार।
देश के सबसे कुपोषित 504 जनपदों में 253वां स्थान रखने वाले हरिद्वार जिले को कुपोषण से मुक्त करने के लिए जिला प्रशासन ने पहल की है। जनपद में पांच वर्ष तक के 39.1 फीसदी बच्चे कुपोषण का शिकार पाए गए हैं। बच्चों में पोषण के स्तर पर यह चौंकाने वाली तस्वीर नीति आयोग की सर्वे रिपोर्ट में सामने आई है। बच्चों के वजन के आधार पर उन के पोषण का स्तर निकाला गया और इसकी तुलना विभिन्न आयु के अनुसार आदर्श वजन से की गई।
सर्वे में आए आंकड़ोे ने जिला प्रशासन के कान खड़े कर दिए। ऐसे में प्रशासन ने जनपद के कुपोषित बच्चों को केंद्र में भर्ती करके भरपूर खुराक देने का फैसला लिया है। जिलाधिकारी ने बच्चों को खुराक देने के साथ उनकी तीमारदारी करने वाले अभिभावकों को मजदूरी देने के लिए दो लाख रुपये का बजट जारी किया है। संबंधित बच्चों को इलाज देने के लिए प्रक्रिया शुरू कराने के दिशा निर्देश जारी किए गए हैं।
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हरिद्वार जनपद में 248 बच्चे अति कुपोषित हैं। इन बच्चों को पोषण पुष्टाहार केंद्र से नियत खुराक संबंधित आंगनबाड़ी केंद्र से दी जाती है। अब जिलाधिकारी को मिली रिपोर्ट के अनुसार आंगनबाड़ी केंद्र से मिल रही खुराक से कुपोषित बच्चों के स्वास्थ्य में कोई सुधार नहीं हो पा रहा है। जिसे जिलाधिकारी दीपक रावत ने गंभीरता से लिया है। इन बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार कराने के साथ इलाज के लिए नई पहल शुरू की गई है। इन कुपोषित बच्चों को मेला अस्पताल परिसर में बने पोषण पुष्टाहार केंद्र में भर्ती करके खुराक देने के साथ-साथ उनका इलाज किया जाएगा। साथ ही इन बच्चों की तीमारदारी के लिए आए अभिभावकों को भी 100 रुपये प्रतिदिन की मजदूरी नगद दी जाएगी। इसके लिए जिलाधिकारी दीपक रावत ने दो लाख रुपये का बजट जारी कर दिया है। उन्होंने बताया कि कुपोषित बच्चों के इलाज में लापरवाही पर संबंधित अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई होगी।
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बड़ा सवाल: बिना डाक्टर के कैसे होगा इलाज
मेला अस्पताल में सन 2012 में बने पोषण पुष्टाहार केंद्र को स्थायी डाक्टर नहीं मिल सका है। जिला अस्पताल के डा. संदीप निगम के सहयोग से केंद्र में बच्चों का जैसे-तैसे उपचार किया जाता है। अब उनके महिला अस्पताल में तबादला होने के बाद से स्थिति विकट हो गई है।
जनपद में बच्चों के कुपोषित होने पर इनके इलाज के लिए पोषण पुष्टाहार केंद्र खोला गया। कुपोषित बच्चे डायरिया, निमोनिया, बुखार आदि की बीमारी से अधिक पीड़ित होते हैं। इन बच्चों को अलग केंद्र में इलाज के साथ तीमारदार करने वाले अभिभावक को दैनिक मजदूरी देने का प्रावधान किया गया। इस केंद्र के लिए जिला अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ डा. संदीप निगम को जिम्मेदारी सौंपी थी। अब उनका महिला अस्पताल में तबादला होने पर नवजात बच्चों की देखरेख करने से उन्हें कम समय मिल पाता है। इसका ही नतीजा है कि केंद्र में इस समय मात्र एक बच्चा भर्ती है।
पूर्व सीएम हरीश रावत की पहल रह गई अधूरी
अगस्त 2016 में तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत ने भेल के सभागार में खिलती कलियां योजना का उद्घाटन करते हुए हर बच्चे को पूर्ण पोषण देने की घोषणा की थी। कहा था कि कुपोषित बच्चों को पूर्ण पोषण देने के लिए जनपद में राजनीतिक दल, सामाजिक संस्थाएं एवं अधिकारी दो-दो बच्चों को गोद लेंगे एवं उनकी मोनीटरिंग करेंगे। लेकिन उनकी कवायद केवल भाषण में ही रह गई थी।