{"_id":"5ab7e8bf4f1c1b57408b4e8d","slug":"101522002111-haridwar-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"पतंजलि योगपीठ ने 92 संयासी राष्ट्र को किए समर्पित","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
पतंजलि योगपीठ ने 92 संयासी राष्ट्र को किए समर्पित
Updated Sun, 25 Mar 2018 11:51 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
हरिद्वार।
योग गुरु बाबा रामदेव के 24वें संन्यास दिवस पर पतंजलि योगपीठ की ओर से रविवार को 92 विद्वान और विदुषी संन्यासियों को राष्ट्र को समर्पित किया। ये सभी संन्यासी अष्टाध्यायी, व्याकरण, वेद, वेदांग और उपनिषद में दीक्षित हैं। इनमें 51 ब्रह्मचारी और 41 विदुषी शामिल हैं। इस अवसर पर बाबा रामदेव ने कहा कि भगवान राम की संन्यास मर्यादा, वेद, गुरु और शास्त्रों की मर्यादा में रहते हुए नए संयासी एक बहुत बड़े संकल्प के लिए प्रतिबद्ध हो रहे हैं।
बाबा रामदेव के अहम मिशन को पूरा करने के लिए रविवार को हरकी पैड़ी के सामने वीआईपी घाट पर विराट कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस दौरान बा रामदेव ने कहा कि इन संन्यासियों के रूप में हम अपने ऋषियों के उत्तराधिकारियों को भारतीय संस्कृति तथा परंपरा के प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि हमारा लक्ष्य सन् 2050 तक 1000 संन्यासियों को दीक्षित करना है। ये संन्यासी हमारे पूर्वजों, ऋषि-मुनियों की पताका पूरे विश्व में फहराएंगे।
इससे पहले देव, ऋषि, सूर्य, अग्नि आदि को साक्षी मानकर सभी संन्यासियों का मुख्य विरजा होम और मुंडन संस्कार पतंजलि के नवनिर्मित ऋषिग्राम में किया गया। 21 मार्च से में संचालित चतुर्वेद महापारायण यज्ञ की पूर्णाहूति के बाद सभी संन्यासी शोभायात्रा के साथ वीआईपी घाट पहुंचे। सांकेतिक रूप से सभी संयासियों ने शिखासूत्र और यज्ञोपवीत गंगा में विसर्जित की। इन सभी ने गंगा में स्नान के बाद अपने श्वेत वस्त्र त्यागकर भगवा वस्त्र धारण किए। उसके बाद स्वामी रामदेव और संतों की ओर से 92 संन्यास दीक्षुओं को सिर पर पुरुषसुक्त के मंत्रों से 108 बार गंगा जल से अभिषेक कर संन्यास संकल्प दिलाया गया।
विज्ञापन
इस अवसर पर बाबा रामदेव ने कहा कि संन्यासी होना जीवन का सबसे बड़ा गौरव है। अब ये सभी 92 संन्यासी ऋषि परंपरा का निर्वहन करते हुए मातृभूमि, ऋषिसत्ता और अध्यात्मसत्ता में जीवन व्यतीत करेंगे। उन्होंने कहा कि वे माता-पिता धन्य हैं जो अपनी संतानों को मातृभूमि के लिए समर्पित कर रहे हैं।
पतुंजलि योगपीठ के महामंत्री आचार्य बालकृष्ण ने कहा कि सभी अविवेकपूर्ण कामनाओं और विषय भोगों से मुक्त रहकर संन्यासी होना दुनिया का सबसे बड़ा उत्तरदायित्व व गौरव है। उन्होंने कहा कि गुरु बनना आसान है, लेकिन एक शिष्य के रूप में गुरुधर्म व राष्ट्रधर्म का पालन करना कठिन है।
भारत माता मंदिर के संस्थापक स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि ने कहा कि गौतम बुद्ध, शंकराचार्य और समर्थ गुरु रामदास के बाद इतनी बड़ी सामूहिक संयास दीक्षा किसी ने नहीं दी। उन्होंने कहा कि एक साथ इतनी बड़ी संख्या में संन्यासियों को देश सेवा में समर्पित करना रामराज्य की स्थापना, ऋषि परंपरा और भावी आध्यात्मिक भारत के सपने को साकार करने जैसा है। उन्होंने कहा कि संन्यास आश्रम सर्वश्रेष्ठ है।
कार्यक्रम में वात्सल्य ग्राम की संस्थापक साध्वी ऋतंभरा ने कहा कि पावन परंपरा का साक्षी बनना परम सौभाग्य है जहां राष्ट्र को इतनी संख्या में संयासी समर्पित किए जा रहे हैं। एक सच्चा संन्यासी वैदिक परंपरा को समर्पित होकर मां भारती की कोख को धन्य करता है। सुत्तुर मठ कर्नाटक के जगद्गुरु शिवरात्री देशीकेंद्र महास्वामी ने कहा कि भारतवर्ष में जन्म लेना और गंगा तट पर स्वामी रामदेव से संन्यास की दीक्षा लेना अपनेआप में बड़ा गौरव है।
इस अवसर पर साधना केंद्र आश्रम देहरादून के स्वामी प्रेम विवेकानंद ने कहा कि भारत की आत्मा का मूल तत्व आध्यात्मिकता है, गणित, विज्ञान, राजनीति और कला इत्यादि नहीं हैं। इस दौरान बड़ी संख्या में साधक और उनके परिजन तथा पतंजलि योगपीठ से जुड़े लोग मौजूद रहे।
विज्ञापन
योग गुरु बाबा रामदेव के 24वें संन्यास दिवस पर पतंजलि योगपीठ की ओर से रविवार को 92 विद्वान और विदुषी संन्यासियों को राष्ट्र को समर्पित किया। ये सभी संन्यासी अष्टाध्यायी, व्याकरण, वेद, वेदांग और उपनिषद में दीक्षित हैं। इनमें 51 ब्रह्मचारी और 41 विदुषी शामिल हैं। इस अवसर पर बाबा रामदेव ने कहा कि भगवान राम की संन्यास मर्यादा, वेद, गुरु और शास्त्रों की मर्यादा में रहते हुए नए संयासी एक बहुत बड़े संकल्प के लिए प्रतिबद्ध हो रहे हैं।
बाबा रामदेव के अहम मिशन को पूरा करने के लिए रविवार को हरकी पैड़ी के सामने वीआईपी घाट पर विराट कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस दौरान बा रामदेव ने कहा कि इन संन्यासियों के रूप में हम अपने ऋषियों के उत्तराधिकारियों को भारतीय संस्कृति तथा परंपरा के प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि हमारा लक्ष्य सन् 2050 तक 1000 संन्यासियों को दीक्षित करना है। ये संन्यासी हमारे पूर्वजों, ऋषि-मुनियों की पताका पूरे विश्व में फहराएंगे।
विज्ञापन
इससे पहले देव, ऋषि, सूर्य, अग्नि आदि को साक्षी मानकर सभी संन्यासियों का मुख्य विरजा होम और मुंडन संस्कार पतंजलि के नवनिर्मित ऋषिग्राम में किया गया। 21 मार्च से में संचालित चतुर्वेद महापारायण यज्ञ की पूर्णाहूति के बाद सभी संन्यासी शोभायात्रा के साथ वीआईपी घाट पहुंचे। सांकेतिक रूप से सभी संयासियों ने शिखासूत्र और यज्ञोपवीत गंगा में विसर्जित की। इन सभी ने गंगा में स्नान के बाद अपने श्वेत वस्त्र त्यागकर भगवा वस्त्र धारण किए। उसके बाद स्वामी रामदेव और संतों की ओर से 92 संन्यास दीक्षुओं को सिर पर पुरुषसुक्त के मंत्रों से 108 बार गंगा जल से अभिषेक कर संन्यास संकल्प दिलाया गया।
विज्ञापन
इस अवसर पर बाबा रामदेव ने कहा कि संन्यासी होना जीवन का सबसे बड़ा गौरव है। अब ये सभी 92 संन्यासी ऋषि परंपरा का निर्वहन करते हुए मातृभूमि, ऋषिसत्ता और अध्यात्मसत्ता में जीवन व्यतीत करेंगे। उन्होंने कहा कि वे माता-पिता धन्य हैं जो अपनी संतानों को मातृभूमि के लिए समर्पित कर रहे हैं।
पतुंजलि योगपीठ के महामंत्री आचार्य बालकृष्ण ने कहा कि सभी अविवेकपूर्ण कामनाओं और विषय भोगों से मुक्त रहकर संन्यासी होना दुनिया का सबसे बड़ा उत्तरदायित्व व गौरव है। उन्होंने कहा कि गुरु बनना आसान है, लेकिन एक शिष्य के रूप में गुरुधर्म व राष्ट्रधर्म का पालन करना कठिन है।
भारत माता मंदिर के संस्थापक स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि ने कहा कि गौतम बुद्ध, शंकराचार्य और समर्थ गुरु रामदास के बाद इतनी बड़ी सामूहिक संयास दीक्षा किसी ने नहीं दी। उन्होंने कहा कि एक साथ इतनी बड़ी संख्या में संन्यासियों को देश सेवा में समर्पित करना रामराज्य की स्थापना, ऋषि परंपरा और भावी आध्यात्मिक भारत के सपने को साकार करने जैसा है। उन्होंने कहा कि संन्यास आश्रम सर्वश्रेष्ठ है।
कार्यक्रम में वात्सल्य ग्राम की संस्थापक साध्वी ऋतंभरा ने कहा कि पावन परंपरा का साक्षी बनना परम सौभाग्य है जहां राष्ट्र को इतनी संख्या में संयासी समर्पित किए जा रहे हैं। एक सच्चा संन्यासी वैदिक परंपरा को समर्पित होकर मां भारती की कोख को धन्य करता है। सुत्तुर मठ कर्नाटक के जगद्गुरु शिवरात्री देशीकेंद्र महास्वामी ने कहा कि भारतवर्ष में जन्म लेना और गंगा तट पर स्वामी रामदेव से संन्यास की दीक्षा लेना अपनेआप में बड़ा गौरव है।
इस अवसर पर साधना केंद्र आश्रम देहरादून के स्वामी प्रेम विवेकानंद ने कहा कि भारत की आत्मा का मूल तत्व आध्यात्मिकता है, गणित, विज्ञान, राजनीति और कला इत्यादि नहीं हैं। इस दौरान बड़ी संख्या में साधक और उनके परिजन तथा पतंजलि योगपीठ से जुड़े लोग मौजूद रहे।