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फ्रांस के एलिक्स ने ओम में देखा ब्रह्मांड का रहस्य
अमर उजाला, हेमवती नंदन भट्ट, ऋषिकेश
Updated Tue, 27 Aug 2013 10:05 PM IST
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कहते हैं ज्ञान एक जगह समाहित नहीं किया जा सकता और ना ही इसकी कोई सीमाएं ही हैं, जिसमें ज्ञान को जकड कर बांध लिया जाए।
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अगर भारतीयों में विदेश जाने, वहां की संस्कृति में रमने और विदेशी भाषाओं के प्रति जुनून बढ़ रहा है, तो विदेशी भी भारतीय संस्कृति से खुद को आकर्षित होने से नहीं बचा पा रहे हैं।
संस्कृत सीखने में विदेशियों की रुचि
ऋषिकेश आने वाले विदेशी जिज्ञासुओं एवं साधकों में भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं को जानने, संस्कृत भाषा को सीखने और धर्मग्रंथों का संदेश प्राप्त करने का जुनून झलकता है।
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तीर्थनगरी में आए दो विदेशी पर्यटक इन दिनों संस्कृत भाषा और भारतीय सांस्कृतिक परम्पराओं को जानने के लिए आश्रमों की खाक छान रहे हैं।
वह यहां की समृद्ध संस्कृति के न सिर्फ कायल हैं बल्कि उसे करीब से जानने, समझने और अपनाने के लिए प्रयासरत भी दिखते हैं।
बेल्जियम से पहुंचा भारत
बेल्जियम के मारकुस का कहना है कि भारतीय संस्कृति ने मुझे काफी प्रभावित किया। संस्कृत भाषा को सीखने के लिए मैं यहां पर कई आश्रमों में गया।
जहां मुझे महाभारत और भगवद् गीता के बारे में जानकारी मिली। इसके अलावा मैंने वहां जाना कि भारतीय लोग गंगा को इतना पवित्र क्यों मानते हैं। लोग गंगा में डुबकी लगाते हैं। इसका एहसास मुझे तीर्थनगरी आकर और गंगा में स्नान के बाद हुआ।
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ओम का महत्व
उनके साथ आए फ्रांस के एलिक्स का कहना है कि मैंने जाना कि ओम शब्द में संपूर्ण ब्रह्मांड का रहस्य छिपा हुआ है। यही आदि और अंत माना गया है। इसके उच्चारण के बिना भारतीय संस्कृति में कोई भी पूजा-पाठ नहीं होता।
मैंने महाभारत और भगवद् गीता का अध्ययन किया। जिसमें श्रीकृष्ण ने कहा था ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ अर्थात सम्पूर्ण पृथ्वी एक परिवार के समान है।
दुर्लभ है संस्कृति
इसके अलावा मैंने तीर्थनगरी में गंगा के पवित्र जल में नहाने से मन में शांति और स्फूर्ति का अहसास किया। इसीलिए मैं ऐसी दुर्लभ भारतीय संस्कृति को कभी नहीं भूल सकता।