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मानकों की अनदेखी से अभी और होगी तबाही

Tue, 12 Nov 2013 08:43 AM IST
अमर उजाला, देहरादून
अमर उजाला, देहरादून Updated Tue, 12 Nov 2013 08:43 AM IST
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gep will become solution of disaster

केदारनाथ की आपदा के बाद अब जीईपी (ग्रॉस एन्वायरमेंट प्रोडक्ट) को इस तरह से सामने रखा जा रहा है मानो यह हर मर्ज की दवा हो।

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जबकि विशेषज्ञ यह साफ मान रहे है कि जीईपी सिर्फ पैमाना है। उत्तराखंड के भूकंप के जोन चार और पांच में होने के बावजूद कोई ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे हैं।

2014 के बजट में जीईपी को लागू होगा
जीईपी यह तो पता लगा सकता है कि मर्ज कितना गंभीर है पर इस मर्ज का इलाज इस बात से तय होगा कि सरकारें जीईपी का करती क्या हैं। पहले बात जीईपी की। प्रदेश सरकार का दावा है कि 2014 के बजट में जीईपी को लागू किया जाएगा।

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इसके लिए बाकायदा आईपीसीसी के अध्यक्ष आरके पचौरी की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ कमेटी का गठन किया गया। हाल यह है कि इस विशेषज्ञ समिति की दो ही बैठक पिछले दो माह में हो पाई हैं। इस कमेटी को यह तय करना है कि जीईपी के मानक क्या होंगे और इन मानकों का आकलन किस तरह से किया जाएगा।
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इस पर बात करने के लिए प्रदेश सरकार ने अक्तूबर माह में दिल्ली में हिमालयी राज्यों का सम्मेलन बुलाने की बात भी की थी। पर अब नवंबर शुरू हो गया है और अभी तक इस सम्मेलन का अता पता नही है। यह हाल है जीईपी के मानक तय करने का।

जीईपी कितना फायदेमंद होगा यह इससे तय होगा कि जीईपी के मानकों के आधार पर सरकार क्या कदम उठाती है। उत्तराखंड देश में पहला राज्य है जिसने जीईपी को प्रदेश में लागू करने का ऐलान किया है। पर इतना तय है कि सरकारी आय व्यय का हिसाब किताब जीडीपी या सकल घरेलू उत्पाद के आधार पर ही होगा।

खर्च को कम रखने की कोशिश

मसलन सरकार अपने गैर योजनागत खर्च को जीडीपी के तीन प्रतिशत से कम रखने की कोशिश करेंगी। जीडीपी में वृद्धि के हिसाब से यह तय होगा कि योजनाओं के लिए कितना धन आवंटित किया जा सकता है। जीईपी के मानकों के आधार पर सरकार इतना जरूर तय कर सकती है कि विकास की हमें क्या कीमत चुकानी पड़ रही हो।

फिर जीईपी के आधार पर यह तय होता है कि जलवायु परिवर्तन के कारण नुकसान हो रहा है तो लोगों को इस परेशानी से बचाने के लिए भी सरकार को खर्च करना होगा। साफ है कि जीईपी मर्ज का इलाज नहीं है बल्कि मर्ज की ओर इशारा भर है। अगर जीईपी की बात की जा रही है तो यह भी माना जा सकता है कि सरकार जीईपी के आधार पर योजनाएं भी तय करेगी।

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केदारनाथ की आपदा के बाद यह बहस भी उठ खड़ी हुई कि यह आपदा प्राकृतिक है या मानव जनित। इस आपदा को मानव जनित मानने वालों का तर्क है कि नदियों के तल का अतिक्रमण, जंगल का कटान आदि के कारण आपदाओं का प्रकोप बढ़ रहा है।

इतना साफ है कि पर्यावरण की अनदेखी न की गई होती तो आपदा से नुकसान इतना न होता जितना हुआ। मसलन नदियों के फ्लड जोन में निर्माण कार्य, नदियों के किनारे सड़क बनाते समय डायनामाइट का उपयोग आदि कई ऐसे कारण रहे जिसकी वजह से नदियां विकराल हुई और भूस्खलन क्षेत्र बढ़ गए।

मानकों की अनदेखी
पूरा उत्तराखंड भूकंप के लिहाज से जोन चार और पांच में है। इसके बावजूद भवन निर्माण में मानकों की अनदेखी सामान्य बात है।

हिमालयी क्षेत्र जैव विविधता से भरपूर है पर पर्यटन को बढ़ावा देने की कोशिश में संवेदनशील क्षेत्रों में मानव गतिविधि पर कोई रोक नहीं लगाई गई। लिहाजा ये नीतियां खतरनाक साबित हो रही हैं। जीईपी आने के बाद यह कहा जा सकता है कि इन नीतियों में बदलाव आएगा।

अब तक क्या हुआ
- अगस्त में जीईपी पर प्रदेश में पहली बार बैठक हुई। इसमें आईपीसीसी के अध्यक्ष आरके पचौरी सहित विभिन्न स्वयंसेवी संस्थाओं के प्रतिनिधि और पर्यावरणविद् शामिल हुए। मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने कहा कि अगस्त में ही दिल्ली में हिमालयी राज्यों और पड़ोसी देशों के प्रतिनिधियों का सम्मेलन होगा जिसमें जीईपी के मानक तय किए जाएंगे और इस बात पर बहस होगी कि हिमालयी राज्यों में विकास का मॉडल क्या होना चाहिए।

- सितंबर में जीईपी की दूसरी बैठक दिल्ली में हुई। इसमें तय किया गया कि जीईपी के मानक तय किए जाएंगे। मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने विशेषज्ञों से बात की और उन्हें पर्वतीय राज्य में विकास का एक मॉडल सुझाने को भी कहा। मुख्यमंत्री ने कहा कि अक्तूबर में दिल्ली में हिमालयी राज्यों का सम्मेलन होगा।

- अक्तूबर बीतने के बाद अब नवंबर है और अभी तक जीईपी पर न तो तीसरी बैठक हो पाई है और न ही हिमालयी राज्यों का सम्मेलन।

क्या है जीईपी

जीईपी या ग्रास एन्वायरमेंट प्रोडक्ट एक तरह का सूचकांक ही है। वर्तमान व्यवस्था में किसी भी क्षेत्र विशेष के विकास का पैमाना जीडीपी या सकल घरेलू उत्पाद को माना जाता है। इसके तहत हर तरह के संसाधन और सेवाओं का मूल्य आंका जाता है और इसको जोड़ कर क्षेत्र विशेष की कुल आर्थिकी का अनुमान लगाया जाता है।


पर इसमें सबसे बड़ी परेशानी यह है कि कई बार पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले कारण सामने नहीं आ पाते। मसलन बांध बनाने में खर्च और उससे उत्पन्न बिजली, लोगों को मिलने वाले पानी आदि तो जीडीपी का हिस्सा बन जाते हैं पर इससे विस्थापित गांवों को बसाने में हुआ खर्च जीडीपी से गायब हो जाता है।

इसके उलट जीईपी में गांव के विस्थापन का खर्च भी शामिल होता है। ऐसे में जीईपी को तय करने केलिए हर क्षेत्र केलिए पैमाना तय करना होगा।

समय मिलते ही बैठक होगी

प्रदेश सरकार कह रही है कि बैठक के लिए सभी हिमालयी राज्यों, पड़ोसी देशों और राष्ट्रपति से समय मांगा गया है। इसके फेर में जीईपी पर गठित विशेषज्ञ समिति की बैठक भी उलझकर रह गई है।

आईपीसीसी (इंटरनेशनल पैनल फॉर क्लाइमेट चेंज) के अध्यक्ष आरके पचौरी की अध्यक्षता में गठित इस कमेटी को जीईपी के मानक तय करने हैं। इस पर शासन का कहना है कि सभी हिमालयी राज्यों की सहमति के बाद ही जीईपी के मानक तय किए जा सकते हैं।

ऐसा नहीं हो सकता कि जीईपी के उत्तराखंड के लिए एक मानक हों और सिक्किम के लिए दूसरे। इसीलिए विशेषज्ञ समिति की बैठक भी तय नहीं हो पा रही है।

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