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बिना संसाधन आग के बीच वनकर्मी जान बचाएं या जंगल
महेश कुमार/ अमर उजाला, त्यूनी
Updated Wed, 27 Apr 2016 04:20 PM IST
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जंगल की आग
- फोटो : अमर उजाला
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गर्मी बढ़ने के साथ ही उत्तराखंड के जंगलों में आग की घटनाएं बढ़ गई हैं। लेकिन, वन विभाग ने इनसे निपटने की कोई तैयारी नहीं की है। विभाग ने अब तक वनकर्मियों को आग की घटनाओं से निपटने के लिए दी जाने वाली किट तक उपलब्ध नहीं कराई है। ऐसे में वनकर्मी निहत्थे ही धधकते जंगलों में जाने को मजबूर हैं। बिना सुरक्षा उपकरणों के आग बुझाने में कई दफा वनकर्मी झुलस भी चुके हैं, लेकिन विभागीय अधिकारी लापरवाह बने हुए हैं।
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फायर सीजन के दौरान वनकर्मियों को आग बुझाने के लिए विभाग की ओर से द्वारा फावड़ा, गेती, टार्च, जूते, बोतल और बैग आदि सामान उपलब्ध कराया जाता है। लेकिन, चकराता वन प्रभाग में कार्यरत वनकर्मियों को बीते दो सालों से कुछ भी नहीं मिला है। विभाग की लापरवाही का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वन प्रभाग की छह रेंज में कुछ छह ही फावड़े हैं। ऐसे में वनकर्मियों को फायर लाइन को काटने के लिए आस-पास के गांवों से फावड़ा और गेती मांगनी पड़ती है।
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ये हैं मानक
मानकों के अनुसार फायर सीजन के दौरान वनकर्मियों को फावड़ा, गेती, टार्च, पिठ्ठू बैग, बोतल, जूते, ड्रेस उपलब्ध कराए जाने का प्रावधान है। कर्मचारियों को जो विशेष ड्रेस उपलब्ध कराई जाती है। उसे पहनकर 60 डिग्री से भी अधिक का तापमान सहन किया जा सकता है, लेकिन लंबे समय से यह ड्रेस कर्मचारियों को नहीं मिली है।
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गुड-चने के बजट में कटौती
कई मर्तबा फायर सीजन के दौरान वन कर्मियों को वनों में गश्त करते हुए कई दिन तक बीत जाते हैं। ऐसे में शरीर में पानी और अन्य पोषक तत्वों की कमी को पूरा करने के लिए गार्डों को विभाग द्वारा गुड और चना मुहैया कराया जाता है, लेकिन चार साल से इस बजट में भी कटौती कर दी गई है।
जर्जर हालत में चौकियां
वन कर्मियों के पास आग बुझाने को सुविधाओं का टोटा तो है ही साथ ही रात गुजारने के लिए उनके पास छत भी नहीं है। चकराता डिवीजन अंतर्गत देववन, कुनैन, कनासर, कथियान, मुंडाली, डांगूठा, मोल्टा, दारागाड़, खूनीगाड़, चातरा, डेरसा समेत 40 वन चौकियां बदहाल पड़ी हैं। अधिकारियों के निर्देशानुसार फायर सीजन के दौरान वन कर्मियों को बीट छोड़ने के लिए पूरी तरह से मनाही होती है। ऐसे में फायर सीजन के दौरान उन्हें होटल में किराया देकर या फिर ग्रामीणों के यहां पैसे देकर रहना पड़ता है।
आग से हर साल सिकुड़ रहा जंगल
चकराता वन प्रभाग 9000 हेक्टेयर के दायरे में फैला हुआ है। जिसे मोल्टा, बावर, देवघार, कनासर, रिखनाड़, रीवर रेंज में बांटा गया है। वन क्षेत्र अंतर्गत बांस, बुरांश, खारसू, देवदार, चीड़, कैल, रीठा, कचनार, बड़चेई समेत कई बेशकीमती जड़ी बूटियां मिलती है। लेकिन हर साल फायर सीजन के दौरान आग की चपेट में आकर इनका दायरा सिकुड़ता जा रहा है। इसके साथ ही चकराता वन प्रभाग अंतर्गत घुरल, काकड़, सुअर, बारासिंगा, भालू, गिदड़, साही, बंदर, लंगूर, कस्तूरी मृग, बाघ जैसे जानवरों की भरमार है। वनों में लगने वाली आग के कारण इन जानवरों का पारिस्थिति तंत्र भी प्रभावित होता है। आग के कारण इन जानवरों के लिए पानी और चारा पत्ती तक का संकट खड़ा हो जाता है।
लंबे समय से वन कर्मी सुविधाओं के अभाव में जान जोखिम में डालकर वनों की रक्षा कर रहे हैं। कर्मचारियों को सुविधाएं मुहैया नहीं कराई जा रही। शीघ्र ही यदि कर्मचारियों को सुविधाएं मुहैया नहीं कराई जाती तो कर्मचारियों को आंदोलन करेंगे।
- किशन नेगी, अध्यक्ष, फारेस्ट गार्ड यूनियन
मामले में आला अधिकारियों को अवगत कराया जा चुका है। बजट मिलते ही कर्मचारियों को सुविधाएं मुहैया कराई जाएंगी।
- डॉ. दिवाकर सिन्हा डीएफओ