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उत्तराखंड में नदियों की लहरों पर कसेगी लगाम

Fri, 15 Nov 2013 11:27 AM IST
अमर उजाला, देहरादून
अमर उजाला, देहरादून Updated Fri, 15 Nov 2013 11:27 AM IST
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flood act can save people

उत्तराखंड में बरसात के मौसम में तबाही मचाने वाली नदियों के बाढ़ क्षेत्र को चिह्नित करने की तैयारी शुरू कर दी गई है।

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सिंचाई विभाग को जिम्मा सौंपा
राजस्व विभाग ने बाढ़ परिक्षेत्रण अधिनियम 2012 का हवाला देते हुए सिंचाई विभाग को यह जिम्मा सौंपा है। राजस्व विभाग का कहना है कि इस काम के लिए अपना राजस्व रिकॉर्ड भी सिंचाई विभाग को उपलब्ध कराएगा और साथ ही सिंचाई विभाग की ओर से फ्लड जोन मैपिंग होने के बाद अपने रिकॉर्ड को दुरूस्त करेगा।

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राजस्व विभाग अपर सचिव विजय ढौंडियाल की ओर से जारी आदेश के मुताबिक केदारनाथ की आपदा के बाद नदियों के किनारे के संवेदनशील क्षेत्रों को राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज करना जरूरी हो गया है। इसके लिए बाढ़ परिक्षेत्रण अधिनियम 2012 के तहत बाढ़क्षेत्र, बाढ़ मैदान परिक्षेत्र आदि को चिह्नित करने की व्यवस्था है।
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इसके लिए सिंचाई विभाग को बाढ़परिक्षेत्रण अधिकारी नियुक्त करना होगा। राजस्व विभाग ने सिंचाई विभाग को एक्टिव फ्लड जोन चिह्नित करने और नदी वार इसका रिकॉर्ड जिलाधिकारियों तथा शासन को उपलब्ध कराने को कहा है। सिंचाई विभाग के स्तर पर अब इसकी तैयारी भी शुरू कर दी गई है।

क्या है फायदा
फ्लड जोन मैपिंग को अब जरूरी माना जा रहा है। केदार घाटी में 16-17 जून को भारी बरसात से उफनाई नदियों ने खासा नुकसान किया था। उस समय यह महसूस किया गया कि कुछ साल के अंतर में नदी अपना प्रवाह बदल देती है। ऐसे में नदियों की इस छूटी हुई जमीन पर खेत से लेकर घर तक बनने लगते हैं।

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पर यह आशंका बनी रहती है कि नदी अपने पुराने रास्ते पर लौट आए। फ्लड जोन मैपिंग होने पर यह पता लग जाएगा कि नदी पहले कहां तक बहती थी और बाढ़ आने की दशा में इसका पानी कहां तक आ सकता है।

प्रदेश में कई ऐसे स्थान हैं जो नदियों के फ्लड जोन में बने हुए हैं। मसलन पूरा गढ़वाल श्रीनगर अलकनंदा नदी के फ्लड जोन पर बसा बताया जाता है। इसी तरह अन्य कई इलाके हैं जहां पहले नदी का साम्राज्य था पर अब बस्तियां बन गई हैं।


बाढ़ परिक्षेत्रण अधिनियम
बाढ़ क्षेत्र को चिह्नित करने के लिए प्रदेश सरकार ने 2012 में बाढ़ परिक्षेत्रण अधिनियम लागू किया था। इसके तहत नदियों के किनारे एक निर्धारित दूरी तक किसी तरह के निर्माण को प्रतिबंधित किया गया है। इसके साथ ही नदियों से अतिक्रमण हटाने पर भी जोर दिया गया है।

केंद्रीय जल संसाधन मंत्री हरीश रावत भी इस मुद्दे को उठा चुके हैं। हरीश रावत के मुताबिक जल संसाधन मंत्रालय प्रदेश सरकार की पूरी मदद करने को तैयार है। इसके लिए जल संसाधन मंत्रालय के अधिकारियों और सिंचाई विभाग के अधिकारियों के बीच एक दौर की बातचीत हो चुकी है।

यह मामला हाईकोर्ट में भी उठ चुका है। एक पीआईएल में हाईकोर्ट ने इस बात पर सख्त आपत्ति जताई थी कि बाढ़ से प्रभावित हो सकने वाली नदी किनारे की भूमि भी आवंटित कर दी गई।

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