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देसी वनस्पतियों के 'घर' में विदेशी पौधों ने लगाई सेंध

Tue, 24 May 2016 12:51 PM IST
रजा शास्त्री/ अमर उजाला, देहरादून
रजा शास्त्री/ अमर उजाला, देहरादून Updated Tue, 24 May 2016 12:51 PM IST
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extinction of indigenous plants
- फोटो : अमर उजाला

163 विदेशी वनस्पतियों की प्रजातियों ने उत्तराखंड की मध्य हिमालयी रेंज पर कब्जा कर लिया है। हिमालयी इको सिस्टम में सालों पहले घुसे अमेरिकी, साउथ अफ्रीकी और यूरोपीय पौधों के कारण देसी वनस्पतियों के सामने अस्तित्व का संकट पैदा हो गया है।

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हिमालयी जैव विविधता का सामंजस्य बिगड़ रहा है। भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण (बीएसआई) का कहना है कि इन ‘विदेशी आक्रांता’ वनस्पतियों से हिमालयी जलस्रोत और बायो डायवर्सिटी भी प्रभावित हो रही है। बीएसआई के सर्वे में जिन विदेशी वनस्पतियों की सूची तैयार की गई है उनमें 76 फीसदी पौधे अमेरिकी हैं। ये अमेरिका के पांच भौगोलिक क्षेत्र से यहां आए हैं।
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चार फीसदी यूरोप के हैं और बाकी साउथ अफ्रीका मूल के पौधे हैं। इन विदेशी पौधों में वनस्पतियां, जड़ी-बूटियां, लताएं और पेड़ शामिल हैं। इनमें पेड़ों की पांच प्रजातियां हैं। 84 प्रजातियां जड़ी-बूटियों की हैं। इनका इस्तेमाल क्षेत्रीय लोग करते हैं। इकीनोकोलोआ क्रस गाली, लैगासिया, मॉलिस, लैंटाना कैमारा आदि पांच वनस्पतियों का इस्तेमाल एलोपैथिक दवाओं में भी बताया जाता है। लेकिन इनके कारण देसी वनस्पतियों को नुकसान पहुंच रहा है।
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इनमें अधिकांश वनस्पतियां इको सिस्टम को बिगाड़ने वाली हैं। विदेशी वनस्पतियों ने कृषि वाली भूमि, संरक्षित क्षेत्रों, नदी के तटों, सड़कों के दोनों किनारों और रिजर्व फारेस्ट पर कब्जा कर लिया है। जहां ये वनस्पतियां पहुंचीं वहां की देसी प्रजाति को इन्होंने नष्ट कर दिया है। इसके साथ बायो डायवर्सिटी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।


ऐसे पहुंची भारत
विदेशी वनस्पतियों के बीज अनाज के साथ विदेशों से आए हैं। कुछ पौधों के बीज यहां घूमने आने वालों के साथ आ सकते हैं। बहरहाल अब राष्ट्रीय जैव विविधता बोर्ड ने पूरी तरह रोक लगा दी है। सवाल विदेशी वनस्पतियों के बढ़ने से देसी प्रजातियों के नष्ट होने के खतरे का है। इनसे निजात का एक ही तरीका है कि इन्हें मैनुअली उखाड़ा जाए।
- डॉ. एसके श्रीवास्तव, निदेशक बीएसआई

यह है नुकसान
- मिट्टी की संरचना, प्रोफाइल, डिकम्पोजीशन, पोषक तत्व और नमी में बदलाव का खतरा
- जैव विविधता के संरक्षण और स्थायित्व में आ सकती है दिक्कत
- देसी वनस्पतियों का पलायन, अस्तित्व खत्म होने का खतरा
- इको सिस्टम और जलस्रोतों की संरचना में खराबी

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