उत्तराखंड के जंगलों में सालों से बिखरा पड़ा है 'पेट्रोल'
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उत्तराखंड के जंगलों में लगभग तीन करोड़ टन चीड़ के पत्ते (पेरुल) भरे पड़े हैं। चार साल से जंगलों में पेरुल नहीं हटाया गया। जंगल में आग लगने पर पेरुल पेट्रोल की तरह काम करता है।
हालत यह है कि चीड़ के पेड़ काटने संबंधी अनुमति के लिए शासन न तो सुप्रीम कोर्ट गया और न ही इस संबंध में केंद्र को प्रस्ताव भेजा। अब जब जंगलों में आग धधक रही है तो चीड़ के पेड़ काटने के लिए वन अनुसंधान संस्थान से शोध करने के लिए कहा गया है। शोध पूरा होने के बाद चीड़ के पेड़ काटने के संबंध में प्रस्ताव तैयार किया जाएगा।
उत्तराखंड के जंगलों के 18 प्रतिशत भाग में चीड़ का कब्जा है। चीड़ के जंगल वनस्पतियों और वन्य जीवों के पनपने के लिए मुफीद नहीं है। इसके पत्ते आग को और भयावह बना देते हैं। इन पर चलकर लोग फिसल कर गिरते हैं।
पत्तों को ‘चैसबोर्ड पैटर्न’ पर जलाने का प्रावधान
चीड़ के जंगलों में सबसे अधिक आग पत्ते जलाने की वजह से लगती है। इन पत्तों को ‘चैसबोर्ड पैटर्न’ पर जलाने का प्रावधान है, लेकिन वन विभाग ने पत्तों को नहीं जलाया। वर्ष 2012 की आग के बाद चीड़ के पत्ते उसी तरह पड़े हुए हैं। इस वक्त इनकी मात्रा तीन करोड़ टन के लगभग पहुंच गई है।
पहले पेरुल के पत्तों को मुफ्त उठाए जाने की अनुमति के बाद भी कोई पत्ता उठाने के लिए नहीं आया। शासन की यह रणनीति फेल हो गई थी। बाद में चीड़ के कटान के लिए कैबिनेट से अनुमति ली गई।
सुप्रीम कोर्ट से अनुमति लेने के लिए केंद्र सरकार को पहले प्रस्ताव भेजा जाना था, लेकिन अभी तक विभाग ने प्रस्ताव नहीं किया। अपर प्रमुख वन संरक्षक गंभीर सिंह ने बताया कि वन अनुसंधान संस्थान से शोध करवा कर स्टेटस रिपोर्ट ली जा रही है।
अतिरिक्त फैक्ट
- एक हेक्टेयर जंगल में निकलता है 8 टन पेरुल
- प्रदेश में 34 लाख हेक्टेयर कुल वन क्षेत्र
- कुल वन क्षेत्र के 18 फीसदी हिस्से में चीड़ के जंगल
- हर साल गिरता है तकरीबन 75 लाख टन पेरुल