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हेमकुंड साहिबः यात्रा ट्रैक बदहाल, बल्लियों से नदी पार कर रहे यात्री
विजय बमोला/अमर उजाला, जोशीमठ (चमोली)
Updated Tue, 24 Sep 2013 09:59 AM IST
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आपदा के तीन माह बाद शुरू हुई हेमकुंड साहिब यात्रा ने राहत और पुनर्वास जैसे मुद्दों पर पहले से ही घिरी सरकार की पोल खोल कर रख दी है। आलम यह है कि भ्यूंडार से घांघरिया तक बनाए गए पैदल मार्ग का खड़ंजा उखड़ने लगा है।
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यात्रा के शुभारंभ पर गोविंदघाट में मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में कहा था कि घांघरिया में स्थाई पुल का निर्माण किया गया है लेकिन यहां स्थायी पुल नहीं बल्कि बल्लियों को आपस में जोड़कर पुल बनाया गया है और यह कभी भी ध्वस्त हो सकता है। बारिश होने पर लक्ष्मण गंगा का जल स्तर बढ़ने से भी पुल को खतरा पैदा हो सकता है।
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भ्यूंडार में भी सिर्फ बल्लियों के सहारे पुल बनाया गया है। पैदल पुलों की गुणवत्ता भी घटिया है। सुरक्षा व्यवस्था के नाम पर हेमकुंड साहिब के 21 किमी के पैदल ट्रैक पर मात्र सात पुलिस जवान गोविंदघाट चौकी में तैनात हैं। भ्यूंडार पुलिस चौकी अभी भी बंद पड़ी हुई है। यात्रा मार्ग पर कहीं भी सार्वजनिक स्टेंड पोस्ट नहीं लगाए गए हैं।
तीर्थयात्री लक्ष्मण गंगा के पानी से अपनी प्यास बुझा रहे हैं। गोविंदघाट से डेढ़ किमी के बाद संचार सेवा ठप है। तहसील प्रशासन ने भी तीर्थयात्रियों को उनके हाल पर छोड़ दिया। उपजिलाधिकारी एपी बाजपेई जोशीमठ से घांघरिया तक हेलीकॉप्टर से और यहां से घोडे़ में हेमकुंड साहिब पहुंचे जिससे वे पैदल रास्ते की दुश्वारियों से भी रू-ब-रू नहीं हो सके।
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तीर्थयात्रियों के लिए हेमकुंड साहिब में न तो संचार की सुविधा मुहैया की गई है और न ही यहां सुचारु विद्युत व्यवस्था है। संगरूर से 40 सदस्यीय दल के साथ हेमकुंड साहिब पहुंचे भगत सिंह का कहना है कि सरकार ने दुबारा यात्रा शुरू की है, यह अच्छी पहल है, लेकिन तीर्थयात्रियों के लिए व्यवस्थाएं सुचारु की जानी चाहिए थी। पैदल मार्ग पर पीने का पानी तक नहीं मिला।
वीरान पड़ाव
आपदा के बाद वीरान पडे़ हेमकुंड साहिब के पड़ावों में आज घोडे़-खच्चरों के टापू की आवाज सन्नाटा तोड़ रही है। जबकि यात्राकाल में इन दिनों पैदल मार्ग पर हजारों तीर्थयात्रियों का सैलाब देखने को मिलता था। लेकिन आपदा के बाद शुरु हुई यात्रा में सीमित संख्या में पहुंच रहे तीर्थयात्रियों की आवाजाही ही हो पा रही है। जंगलचट्टी, भ्यूंडार, कांजिलाखर्च हेमकुंड साहिब तीर्थयात्रा के प्रमुख पड़ाव हैं। लेकिन यात्रा शुरु होने के बाद भी यहां वीरानी पसरी हुई है।
तबाही की गवाही दे रहा भ्यूंडार-पुलना गांव
जलप्रलय में समाया भ्यूंडार-पुलना गांव आज भी तबाही के उस मंजर की गवाही दे रहा हैं। जून की आपदा से पहले इस गांव में 99 परिवार रहते थे। तब इस गांव में खूब चहल-पहल थी। यात्रियों की आमद से गांव भी गुलजार रहता था। आज इस गांव में टूटे हुए आवासीय भवन और लक्ष्मण गंगा के मलबे के सिवाय कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा है।
इस गांव के ग्रामीण घांघरिया में टेंट लगाकर दिन बिता रहे हैं। कुछ प्रभावित तीन माह से जोशीमठ में किराए के मकानों में रह रहे हैं। उन्हें दुबारा जिंदगी शुरू होने का बेसब्री से इंतजार है।