{"_id":"532f2e9dee7298707a74771836daa202","slug":"sarda-mines-hindi-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"शारदा खनन से अब न राजस्व और न रोजगार","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
शारदा खनन से अब न राजस्व और न रोजगार
चंद्रशेखर जोशी/अमर उजाला, चंपावत
Updated Sun, 17 Jan 2016 10:23 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
टनकपुर की शारदा केवल प्यास ही नहीं बुझाती है, बल्कि लोगों के पेट की भूख भी मिटाती है। यहां होने वाले खनन से 3500 परिवारों के 17500 लोगों को रोजगार मिलता था, मगर अब उनकी इस रोजी-रोटी पर मार पड़ रही है। वहीं सरकारी खजाने को भी चूना लगने का खतरा है। इसकी वजह पट्टेदारों के अलावा किसी अन्य कारोबारी को खनन सामग्री के स्टॉक करने पर लगाई रोक है।
विज्ञापन
एसडीएम नरेश दुर्गापाल के मुताबिक शारदा से इस सीजन में 19 लाख घन मीटर खनन सामग्री की निकासी की अनुमति है। इस निकासी से सरकारी खजाने में 38 करोड़ रुपये आते, मगर अब तक मात्र 60 हजार घन मीटर की निकासी हो सकी है, जिससे 1.2 करोड़ रुपये हासिल हुए हैं। प्रशासन का कहना है कि मौजूदा हालात में दो लाख घन मीटर (4 करोड़ रुपये का राजस्व) से अधिक निकासी संभव नहीं लगती। यानि 34 करोड़ का नुकसान, जबकि पिछले सीजन में ही 3 लाख घन मीटर की निकासी होने से 6 करोड़ का राजस्व प्राप्त हुआ था।
विज्ञापन
पिछले साल तक करीब 150 लोग खनन सीजन में (अक्तूबर से मई तक) पत्थर खरीद कर खेतों में एकत्र करते थे। ये लोग करीब 3 लाख घन मीटर तक स्टॉक करते थे, मगर इस बार ये मायूस हैं। इसके अलावा शारदा से होने वाले खनन सेे करीब 300 शक्तिमान मालिकों के अलावा 400 ड्राइवर, 400 क्लीनर और करीब ढाई हजार मजदूर जुड़े हैं। तकरीबन 3500 परिवारों के 17500 लोगों का भविष्य इस काम से जुड़ा है। परोक्ष रूप से यहां के दर्जनों मोटर वर्कशॉप और पेट्रोल पंपों के लिए खनन उनके धंधे के पहिए को घुमाता है।
विज्ञापन
खेती लायक नहीं रह गए खाली पड़े खेत
खनन सामग्री स्टॉक करने की नीति में संशोधन की वजह से टनकपुर के लोग अब स्टॉक नहीं कर पा रहे हैं। महेश सिंह, महेश पपरा सहित तमाम लोगों का कहना है कि बदली हुई नीति से न केवल उन्हें भारी नुकसान हो रहा है, बल्कि लंबे समय से पत्थर पड़े रहने से अब उनके खेत भी खेती लायक नहीं रह गए हैं। पूर्व में स्टॉक करते रहे लोगों का कहना है कि टनकपुर स्टोन क्रशर की क्षमता कम है, जबकि यहां के पत्थर को खटीमा, सितारगंज से दूर बेचने पर लागत नहीं आती। इन शहरों में खनन सामग्री की मांग नहीं है।
पट्टेदार और स्टोन क्रशर ही कर सकते हैं स्टॉक
खनन स्टॉक नीति में बदलाव से अब स्टॉक करने की अनुमति सिर्फ पट्टेदार और स्टोन क्रशर ही कर सकता है। शारदा से एकमात्र पट्टेदार उत्तराखंड वन विकास निगम है। वही स्टॉक कर सकती है, मगर स्टॉक करने के लिए निगम ने अब तक टेंडरिंग प्रक्रिया नहीं कराई है। खनन स्टॉक नीति को संशोधित करने की मांग इसी माह चंपावत आए मुख्यमंत्री हरीश रावत के सम्मुख उठाई भी गई थी।
शारदा खनन की मात्रा ज्यादा है, जबकि निकासी इस अनुपात में नहीं हो पाती है। मात्र दो स्टोन क्रशर हैं, जिनकी क्षमता महज 60 हजार घन मीटर की है। इनकी क्षमता भी शनिवार शाम को पूरी हो गई है। वहीं प्रदेश की दूसरी नदियों में स्टोन क्रशर काफी ज्यादा होने से पत्थर निकासी की दिक्कत नहीं आ रही है। टनकपुर स्टोन क्रशर की कम क्षमता के मद्देनजर नियमों में शिथिलता करते हुए प्राइवेट स्टॉकिस्टों को स्टॉक करने की अनुमति देने का अनुरोध करते हुए शासन को पत्र भेजा गया है।
-दीपेंद्र कुमार चौधरी, जिलाधिकारी।