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नया नजारिया, नई सीख : बिना झिझक कैंची चला रहे एमए, बीएड राम सिंह बोहरा

Amarujala Local Bureau अमर उजाला लोकल ब्यूरो
Updated Sat, 13 Jun 2020 03:52 PM IST
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New approach, New Learning: highly educated youth without hesitation doing hair dressing
पुलहिंडोला में बाल काटते उच्च शिक्षित राम सिंह बोहरा। - फोटो : AMAR UJALA
चंद्रशेखर जोशी, चंपावत। नेपाल सीमा से लगे गुमदेश क्षेत्र का प्रवेशद्वार है पुलहिंडोला। इस कस्बे में एक युवक बड़े करीने से दुकान में आए लोगों के बाल काट रहा है। कस्बे के लोग शुरू में इस नजारे को देख हैरत में आते थे, पर अब हर रोज के ये दृश्य उन्हें सामान्य लगते हैं। सैलून की इस दुकान को चलाने वाला शख्स कोई और नहीं, बल्कि एमए, बीएड पास एक दिव्यांग है। जिसने जाति से ऊपर उठकर इस व्यवसाय को अपनाने में कतई हिचक नहीं दिखाई। और चंद महीनों में सैलून के काम को न केवल रोजगार का अहम जरिया बनाया, बल्कि दूसरों के लिए प्रेरणा भी बन रहे हैं।
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चंपावत से 29 किमी दूर पुलहिंडोला के राम सिंह बोहरा (34) मार्च से सैलून की दुकान चला रहे हैं। किराया व बिजली का सवा हजार रुपये चुकाने के बाद वे करीब छह हजार रुपये से अधिक हर माह आय कर रहे हैं। पांव से कमजोर इस युवा ने शुरू में कई वर्ष तक शिक्षण व दूसरी नौकरी का प्रयास किया। अपेक्षित सफलता न मिली, तो तीन साल तक दिल्ली में होटल में किस्मत आजमाई। अब उन्होंने अपने कस्बे में खुद का काम करने की ठानी। कम पूंजी, स्थानीय जरूरत और काम को जानने के चलते सैलून का काम उनकी स्वाभाविक पसंद बनी। सैलून के काम को लेकर परिवार के अन्य लोगों ने कई बार एतराज भी किया। मगर बोहरा ने अपने तर्को से उन्हें समझा दिया। अब वे भी इस काम को किसी से कमतर नहीं समझते हैं। साथ ही उनके नए नजरिए से क्षेत्र के लोग भी उनसे सीख रहे हैं।
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--::: कटिंग से ज्यादा खर्च लगता था किराये में ::: इस साल के शुरू तक पुलहिंडोला में सैलून की एक भी दुकान नहीं थी। यहां के लोग न तो अपने कस्बे में बाल कटवा पाते थे और नहीं दाढ़ी बनवा पाते थे। इस काम के लिए उन्हें 16 किलोमीटर दूर लोहाघाट जाना पड़ता था। जिसमें किराये के रूप में 80 रुपये तक खर्च हो जाता। यहां के लोग सैलून के काम से ज्यादा खर्च किराये में करने को मजबूर होते थे।
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---::: ऐसे हुई शुरुआत :::; एमए, बीएड राम सिंह बोहरा बताते हैं कि स्कूल के समय से ही अन्य साथियों के बाल काटना उनके लिए फायदेमंद रहा। नौकरी नहीं मिलने पर जब उनके सम्मुख व्यवसाय चुनने का सवाल आया, तो उन्होंने दो कारणों से सैलून के काम को चुना। सैलून के काम की जानकारी और स्थानीय जरूरत को देखते हुए उन्होंने इस काम को करने की ठानी।
--::: स्वरोजगार के लिए चाहिए सरकारी मदद  ::: उच्च शिक्षित राम सिंह बोहरा सैलून के काम को आगे बढ़ाते हुए स्वरोजगार की नई संभावनाओं पर भी विचार कर रहे हैं। मगर धन की कमी इसके आड़े आ रही है। उनका कहना है कि अगर सरकारी योजनाओं का लाभ मिले, तो वे खेती, डेयरी व ग्रामीण क्षेत्र से जुड़े अन्य काम को आगे बढ़ाना चाहेंगे।

New approach, New Learning: highly educated youth without hesitation doing hair dressing
राम सिंह बोहरा। - फोटो : AMAR UJALA
राम सिंह बोहरा।
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