कभी मशाल से रोशन होती थी रामलीला

योगेश जोशी/अमर उजाला, चंपावत Updated Tue, 13 Oct 2015 11:01 PM IST
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उजले इतिहास को अपने दामन में समेटने वाली चंपावत (मल्लीहाट) की रामलीला ने मशाल से लेकर बिजली के उजाले तक का सफर तय किया है। अब यह रामलीला 127वें वर्ष में प्रवेश कर गई है। तीन दशक पहले तक कलाकारों की आवाज इतनी बुलंद होती थी कि माइक की जरूरत भी नहीं पड़ती थी।
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रामलीला कमेटी के अध्यक्ष भगवत सरण राय बताते हैं कि 1889 में पहली बार मशाल की रोशनी में राजबूंगा (किले) के पास रामलीला का मंचन हुआ था। 1952 में नाथलाल साह व्यवस्थापक बने। केरोसिन की उपलब्धता के बाद से रामलीला पैट्रोमैक्स के उजाले में होना शुरू हुई। ये सिलसिला 1965 तक चला। गौड़ी पावर हाउस बनने के बाद 1966 से रामलीला का आयोजन बिजली के उजाले में किया गया। 1963 में 10 वर्ष की उम्र में भरत का किरदार निभाने वाले सुरेश साह बताते हैं कि तब पैट्रोमैक्स के उजाले में रामलीला होती थी। तब तहसीलदार परमिट जारी कर केरोसिन उपलब्ध कराते थे। पैट्रोमैक्स जलाने का जिम्मा सुरेंद्र तड़ागी, ईश्वरीदत्त पचौली, पनीराम, गोपाल प्रहरी, प्रहलाद राम आदि का होता था।
रामलीला के अलावा पथ प्रकाश के लिए 60-65 पैट्रोमैक्सों का उपयोग होता था। कलाकारों की आवाज इतनी बुलंद हुआ करती थी कि माइक की जरूरत ही महसूस नहीं की जाती थी। तब कलाकार रामलीला के दौरान मांस और ठंडी चीजों से परहेज करते थे। लीला देखने के लिए 60 किमी दूर सूखीढांग, चल्थी, मंच, बिस्ज्यूला, सिप्टी और पल्सों गांव से ग्रामीण मशाल जलाकर जत्थों आते थे। खासतौर पर धनुष यज्ञ, सूर्पणखा नासिका छेदन और राजतलिक के दिन खासी भीड़ उमड़ती थी। बसंत तड़ागी के उस समय के बनाए गए मुखौटे और पखवाई आज भी इस्तेमाल किए जा रहे हैं। शांति व्यवस्था बनाने में करम सिंह खाती का आज भी कोई विकल्प नहीं है।
बेहतरीन कलाकारों से सजी होती थी रामलीला
बेहतरीन अदाकारी के दम पर कई कलाकारों ने इस रामलीला को ऊंचा मुकाम दिलाया, इनमें राम के पात्र में तेज सिंह राणा, सीता के एलडी राय, लक्ष्मण के भवान सिंह बिष्ट, रावण के हरिदत्त राय, ताड़का के बोध सिंह तड़ागी, सुलोचना और कैकयी के नारायण पचौली, हनुमान के देब सिंह अधिकारी, कुंभकर्ण के सुरेश साह और खर-दूषण के पात्र इंद्र देव सक्टा और बाद में उनके बेटे खीमानंद सक्टा निभाने थे।

कौमी एकता की बेहतरीन मिसाल

मल्लीहाट की ऐतिहासिक रामलीला ने कौमी दस्तावेज का भी सुनहरा अध्याय लिखा है। 70 के दशक में पुतले बनाने वाले बशीर और वर्तमान में तबला वादक इमाम बख्श कौमी एकता का नायाब नमूना है। इसके अलावा ऐसे परिवार हैं, जो आज भी रामलीला में सहयोग दे रहे हैं। पद्मा दत्त पचौली की चार पीढ़ियां रामलीला के आयोजन में जुटी है। पद्मा दत्त के बेटे मथुरा दत्त पचौली उनके पुत्र भुवन पचौली और भुवन पचौली के भतीजे मुक्तेश पचौली आज भी रामलीला के आयोजन में सहयोग दे रहे हैं।
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