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कंटीले तारबाड़ में फंस कर तेंदुए की मौत
ब्यूरो/अमर उजाला, लोहाघाट (चंपावत)
Updated Sun, 05 Mar 2017 09:12 PM IST
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यहां से करीब नौ किलोमीटर दूर मायावती आश्रम के पास के जंगल में कंटीली तारबाड़ में फंसे एक मादा तेंदुए की मौत हो गई है। कंटीले तारों में फंसा तेंदुआ करीब 12 घंटे तक तड़पता रहा, मगर वन विभाग की टीम उसकी जान बचाने में नाकाम रही। उप प्रभागीय वनाधिकारी के नेतृत्व में मौके पर पहुंची वन विभाग की टीम ने तेंदुए के शव को निकाला। पोस्टमार्टम के बाद रविवार अपरान्ह तेंदुए के शव को जला दिया गया।
शनिवार देर शाम को एक तेंदुआ कंटीले तारों में फंस गया। तारों में फंसा तेंदुआ दहाड़ रहा था। दहाड़ सुनकर शाम 6 बजे अद्वैत आश्रम के स्वामी मौके पर पहुंचे। तारों की जकड़ से निकलने के प्रयास में छटपटाते तेंदुए की जानकारी तुरंत वन महकमे को दी गई। सूचना मिलते ही लोहाघाट के वन क्षेत्राधिकारी दीप जोशी, काली कुमाऊं के पीके पंत, चंपावत के रेंजर ब्रजमोहन टम्टा, मोहन पांडेय, बालम सिंह, दिवान साहू, मोहन चंद्र राय अमित पंत, कैलाश राय आदि वन कर्मी मौके पर पहुंचे।
वन विभाग की टीम ने फौरन हालात की जानकारी उच्चाधिकारियों को दी। वन कर्मियों के पास ट्रेंकुलाइजर गन नहीं थी। इस कारण तेंदुए को कंटीले तारों से नहीं निकाला जा सका। इस बीच रविवार सुबह छह बजे तेंदुए ने दम तोड़ दिया। बाद में उप प्रभागीय वनाधिकारी मनोहर सिंह सेमिया की मौजूदगी में शव को कंटीले तारों से निकालकर पशुपालन विभाग के दो डॉक्टरों डा.डीके चंद और डा.निशांत शर्मा के पैनल ने पोस्टमार्टम किया। पोस्टमार्टम में दम घुटने और पसलियां टूटने की वजह से मौत होना बताया गया है। बाद में तेंदुए के शव को जला दिया गया। एसडीओ ने बताया कि सात फुट लंबे तेंदुए की उम्र करीब ढाई वर्ष थी।
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ट्रेंकुलाइजर गन होती तो बच सकती थी जान
वन विभाग कंटीले तारों में फंसे तेंदुए को बचाने में नाकाम रहा। हालांकि तेंदुए के कटीले तारों में फंसने की सूचना मिलने के बाद वन कर्मी मौके में पहुंच गए, लेकिन तेंदुए को कंटीले तारों से निकालने के लिए कोई उपकरण नहीं होने के कारण वन कर्मी बेबस नजर आए। वन विभाग के पास ट्रेंकुलाइजर गन होती तो शायद तेंदुए की जान बचाई जा सकती थी। लोगों का कहना है कि वन्य जीवों के संरक्षण के लिए वन विभाग के पास ट्रेंकुलाइजर गन उपलब्ध कराई जानी चाहिए। जिससे इस तरह किसी वन्य जीव की मौत न हो सके।
मौत के बाद पहुंची ट्रेंकुलाइजर गन
उप प्रभागीय वनाधिकारी मनोहर सिंह सेमिया का कहना है कि तेंदुए को बचाने के लिए विभाग ने काफी प्रयास किए। जिले में ट्रेंकुलाइजर गन और दवा न होने के कारण पिथौरागढ़, रानीखेत, हल्द्वानी, अल्मोड़ा, रामनगर आदि स्थानों में फोन कर इन्हें मंगाने के प्रयास किए गए। बताया गया कि अल्मोड़ा से ट्रेंकुलाइजर गन के यहां पहुंचने से पहले ही तेंदुए की मौत हो गई। दवा की व्यवस्था कर ली गई थी।
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शनिवार देर शाम को एक तेंदुआ कंटीले तारों में फंस गया। तारों में फंसा तेंदुआ दहाड़ रहा था। दहाड़ सुनकर शाम 6 बजे अद्वैत आश्रम के स्वामी मौके पर पहुंचे। तारों की जकड़ से निकलने के प्रयास में छटपटाते तेंदुए की जानकारी तुरंत वन महकमे को दी गई। सूचना मिलते ही लोहाघाट के वन क्षेत्राधिकारी दीप जोशी, काली कुमाऊं के पीके पंत, चंपावत के रेंजर ब्रजमोहन टम्टा, मोहन पांडेय, बालम सिंह, दिवान साहू, मोहन चंद्र राय अमित पंत, कैलाश राय आदि वन कर्मी मौके पर पहुंचे।
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वन विभाग की टीम ने फौरन हालात की जानकारी उच्चाधिकारियों को दी। वन कर्मियों के पास ट्रेंकुलाइजर गन नहीं थी। इस कारण तेंदुए को कंटीले तारों से नहीं निकाला जा सका। इस बीच रविवार सुबह छह बजे तेंदुए ने दम तोड़ दिया। बाद में उप प्रभागीय वनाधिकारी मनोहर सिंह सेमिया की मौजूदगी में शव को कंटीले तारों से निकालकर पशुपालन विभाग के दो डॉक्टरों डा.डीके चंद और डा.निशांत शर्मा के पैनल ने पोस्टमार्टम किया। पोस्टमार्टम में दम घुटने और पसलियां टूटने की वजह से मौत होना बताया गया है। बाद में तेंदुए के शव को जला दिया गया। एसडीओ ने बताया कि सात फुट लंबे तेंदुए की उम्र करीब ढाई वर्ष थी।
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ट्रेंकुलाइजर गन होती तो बच सकती थी जान
वन विभाग कंटीले तारों में फंसे तेंदुए को बचाने में नाकाम रहा। हालांकि तेंदुए के कटीले तारों में फंसने की सूचना मिलने के बाद वन कर्मी मौके में पहुंच गए, लेकिन तेंदुए को कंटीले तारों से निकालने के लिए कोई उपकरण नहीं होने के कारण वन कर्मी बेबस नजर आए। वन विभाग के पास ट्रेंकुलाइजर गन होती तो शायद तेंदुए की जान बचाई जा सकती थी। लोगों का कहना है कि वन्य जीवों के संरक्षण के लिए वन विभाग के पास ट्रेंकुलाइजर गन उपलब्ध कराई जानी चाहिए। जिससे इस तरह किसी वन्य जीव की मौत न हो सके।
मौत के बाद पहुंची ट्रेंकुलाइजर गन
उप प्रभागीय वनाधिकारी मनोहर सिंह सेमिया का कहना है कि तेंदुए को बचाने के लिए विभाग ने काफी प्रयास किए। जिले में ट्रेंकुलाइजर गन और दवा न होने के कारण पिथौरागढ़, रानीखेत, हल्द्वानी, अल्मोड़ा, रामनगर आदि स्थानों में फोन कर इन्हें मंगाने के प्रयास किए गए। बताया गया कि अल्मोड़ा से ट्रेंकुलाइजर गन के यहां पहुंचने से पहले ही तेंदुए की मौत हो गई। दवा की व्यवस्था कर ली गई थी।