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फसल बचाने को किसान ने की पहल
ब्यूरो/अमर उजाला, चंपावत
Updated Mon, 20 Mar 2017 10:59 PM IST
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चंपावत में जंगली जानवरों से बचाने को लगाई तारबाड़।
- फोटो : अमर उजाला
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जंगली जानवरों से फसल को बचाने के लिए किसान भाइयों ने खुद पहल की है। उन्होंने पांच नाली जमीन का तारबाड़ और पुरानी धोतियों से घेराव किया है। इससे बंदर, सुअर गेहूं, आलू, प्याज, लहसुन, मेथी, मटर आदि फसलों और सब्जियों पर धावा नहीं बोल रहे हैं। उनका यह छोटा सा प्रयास कामयाब होता दिख रहा है। इसके लिए उन्होंने भले ही 3500 रुपए खर्च कर कंटीली तार खरीदी, लेकिन वो इस बात से खुश हैं कि उनकी फसल और सब्जियां सुरक्षित हैं।
शहर से लगे मादली के किसान देव सिंह खाती और वजीर सिंह खाती के पास 125 नाली खेती योग्य जमीन है। इसमें से वह वर्तमान में 60 नाली जमीन पर खेती करते हैं। शेष जमीन पर जानवरों के लिए घास उगाते हैं। किसान देब सिंह खाती कहते हैं कि उनकी अधिकतर जमीन बिखरी है। इसलिए घर के पास की एकमुश्त पांच नाली जमीन की ही घेराबंदी कर सके हैं। वे बताते हैं कि 15 साल पहले तक 125 नाली जमीन पर ही खेती करते थे, लेकिन जंगली जानवरों के आतंक से उन्होंने खेती करना कम कर दिया है।
किसान वजीर सिंह कहते हैं कि पहले की खेती और आज की खेती में बड़ा फर्क आ गया है। वे कहते हैं कि जब जंगली जानवरों की समस्या नहीं थी, तो साल भर के लिए अनाज पैदा कर लेते थे, लेकिन अब स्थितियां बदल गई हैं। उनका कहना है कि तब वो 400 किलो आलू का बीज लगाते थे। अब केवल 40 किलो ही आलू का बीज लगाते हैं। इसी तरह 200 किलो गेहूं और 80 किलो धान के बीज की बुवाई करते थे, लेकिन अब गेहूं उगाना भी कम कर दिया है, जबकि धान लगाना तो बिल्कुल ही बंद कर दिया है।
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शहर से लगे मादली के किसान देव सिंह खाती और वजीर सिंह खाती के पास 125 नाली खेती योग्य जमीन है। इसमें से वह वर्तमान में 60 नाली जमीन पर खेती करते हैं। शेष जमीन पर जानवरों के लिए घास उगाते हैं। किसान देब सिंह खाती कहते हैं कि उनकी अधिकतर जमीन बिखरी है। इसलिए घर के पास की एकमुश्त पांच नाली जमीन की ही घेराबंदी कर सके हैं। वे बताते हैं कि 15 साल पहले तक 125 नाली जमीन पर ही खेती करते थे, लेकिन जंगली जानवरों के आतंक से उन्होंने खेती करना कम कर दिया है।
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किसान वजीर सिंह कहते हैं कि पहले की खेती और आज की खेती में बड़ा फर्क आ गया है। वे कहते हैं कि जब जंगली जानवरों की समस्या नहीं थी, तो साल भर के लिए अनाज पैदा कर लेते थे, लेकिन अब स्थितियां बदल गई हैं। उनका कहना है कि तब वो 400 किलो आलू का बीज लगाते थे। अब केवल 40 किलो ही आलू का बीज लगाते हैं। इसी तरह 200 किलो गेहूं और 80 किलो धान के बीज की बुवाई करते थे, लेकिन अब गेहूं उगाना भी कम कर दिया है, जबकि धान लगाना तो बिल्कुल ही बंद कर दिया है।
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