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सड़क किनारे फेंका जा रहा जिला मुख्यालय का कूड़ा

Thu, 04 May 2017 10:52 PM IST
ब्यूरो/ अमर उजाला, चंपावत
ब्यूरो/ अमर उजाला, चंपावत Updated Thu, 04 May 2017 10:52 PM IST
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District headquarter's garbage being thrown off the road
सड़क पर लगे कूड़े के ढेर - फोटो : अमर उजाला

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चंपावत जिला मुख्यालय की सफाई के हाल अभी भी डेंजर जोन वाले हैं। शहर के कूड़े को फेंकने का इंतजाम अब तक नहीं हो सका है। नगर क्षेत्र का कूड़ा खेतीखान को जाने वाली सड़क के किनारे फेंकने की मजबूरी अब भी बनी है। सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट का कोई सिस्टम भी नहीं बन सका है।

चंपावत जिले में रोज करीब तीन टन कूड़ा शहर से करीब पांच किमी दूर सर्किट हाउस के नजदीक खेतीखान मोटर मार्ग पर फेंका जाता है। मौजूदा कूड़ा डंपिंग जोन को सेहत के लिए खतरनाक बताते हुए प्रभावी और स्थायी समाधान के मानवाधिकार आयोग तक निर्देश दे चुका है, लेकिन इस पर अमल अब तक नहीं हो सका है। जैविक-अजैविक कूड़ेदान तो दूर, कूड़ेदानों की संख्या भी बस 22 है। पालिका का कहना है कि 11 नए कूड़ेदान बनाए जा रहे हैं।
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नगर पालिका के अधिशासी अधिकारी अभिनव कुमार का कहना है कि सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट के लिए शहर से करीब 10 किमी दूर बनलेख के नजदीक जगह की तलाश की गई है, लेकिन अभी इस स्थान को वन अनापत्ति नहीं मिल सकी है। वैसे शहर की सफाई पर महीने में करीब तीन लाख रुपये खर्च होते हैं, मगर शहर में सफाई निरीक्षक तक नहीं है।
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नगर पंचायत को अपग्रेड कर अप्रैल 2013 में नगर पालिका तो बनाया गया, लेकिन पर्यावरण मित्रों (स्वच्छकों) की संख्या नहीं बढ़ सकी। करीब 12 किलोमीटर के दायरे में फैली पालिका में सफाई का सिस्टम नगर पंचायत से बेहतर नहीं हो सका है। महज 8 स्थायी के अलावा 4 संविदा और 7 मोहल्ला स्वच्छता समिति के पर्यावरण मित्र (सफाई कर्मी) हैं। इतने बड़े एरिया और सीमित संसाधनों के बीच सफाई करना बेहद कठिन है। नगर पालिका के अधिशासी अधिकारी अभिनव कुमार का कहना है कि पर्यावरण मित्रों की कमी से परेशानी बढ़ रही है। 23 पदों के सृजन का प्रस्ताव वर्षों से लंबित है।


जुलाई 2014 में चंपावत में आठ लाख रुपये की लागत से कांपेक्टर मशीन लगाई गई थी। मकसद इस मशीन के जरिए पॉलीथिन की रिसाइक्लिंग होनी थी और बचे कूड़े से जैविक खाद बनाई जानी थी, लेकिन स्टाफ की कमी से इस मशीन का कभी उपयोग नहीं हो सका और अब तक कांपेक्टर सफाई का सारथी बनने के बजाय धन की बर्बादी का नमूना बना हुआ है।


डंपिंग जोन होना जरूरी 
लोगों का कहना है कि शहर को गंदगी से बचाने के लिए सबसे पहले डंपिंग जोन का निर्माण जरूरी है। राष्ट्रपति पुरस्कार विजेता रिटायर्ड प्रधानाचार्य डा.बीसी जोशी, सामाजिक कार्यकर्ता डा.प्रकाश जोशी शूल, सेनानी उत्तराधिकारी संगठन जिलाध्यक्ष महेश चंद्र चौड़ाकोटी, रमेश चंद्र, हेमा देवी आदि का कहना है कि तात्कालिक तौर पर स्वच्छकों की संख्या जरूरत के हिसाब से बढ़ाई जानी चाहिए। इसी तरह कूड़ेदानों की तादात बढ़ाने की जरूरत है। इन छोटे-छोटे उपायों से गंदगी को कम किया जा सकता है।
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