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आद्याशक्तिपीठ की संस्थापक गुरु मां माधवी का देहावसान

Haldwani Bureau हल्द्वानी ब्यूरो
Updated Sat, 12 Mar 2022 11:35 PM IST
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Death of madhavai Maa
बूम स्थित आद्याशक्तिपीठ। संवाद न्यूज एजेंसी - फोटो : CHAMPAWAT
टनकपुर (चंपावत)। यहां से आठ किमी दूर बूम (ब्रहमदेव) के प्रमुख आध्यात्मिक स्थल आद्या शक्तिपीठ की संस्थापक श्रीश्री 1008 मां माधवी का शुक्रवार शाम दिल्ली में देहावसान हो गया। दिल्ली से आए पंडित देवशंकर ने शक्तिपीठ में शनिवार को उन्हें समाधिस्थ किया। बंगाल, दिल्ली, लखनऊ, महाराष्ट्र, गोरखपुर आदि जगहों से आए भक्तगणों ने गुरु मां के अंतिम दर्शन किए।
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शक्तिपीठ की संचालिका डॉ. दीदी अनुराधा ने बताया कि नवंबर 1997 में मां माधवी ने आद्या शक्तिपीठ (मातृका आश्रम) की स्थापना की थी। अब श्री मां माधवी के बेटे पूर्णानंद महाराज को शक्तिपीठ की जिम्मेदारी दी गई है। इस दौरान रंजन गुप्ता, दीपक बनर्जी, विक्रांत सिंह, डॉ. पीके विश्वास, डॉ. मनोरजंन, डॉ. भवेश कुमार, डॉ. आनंद, प्रमोद दास, दीपक, गोपाल तिवारी, रामप्रसाद अग्रवाल, दिनेश चंद्र भट्ट आदि थे।
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आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक है आद्या शक्तिपीठ
टनकपुर (चंपावत)। मां पूर्णागिरि धाम के लिए विख्यात चंपावत जिले में पूर्णागिरि मार्ग पर यहां से आठ किमी दूर बूम (ब्रह्मदेव) में आद्या शक्तिपीठ स्थित है। आद्या शाक्तिपीठ के दर्शन से इंसान की सांसारिक कामनाओं की पूर्ति के साथ ही आध्यात्मिक उन्नति भी होती है। मान्यता है कि इसकी परिक्रमा से 33 कोटि देवताओं के पुण्य का लाभ अर्जित होता है। पीठ का निर्माण श्रीश्री 1008 माधवी मां ने किया था।
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पश्चिम बंगाल के वीरभूमि महाश्मशान तारापीठ में 17 मार्च 1963 को अनंत गुरु श्री शंकर बाबा ने एक ऐसे शक्तिपीठ के निर्माण की जरूरत बताई, जो बंगाल से बाहर बनेगा। मंदिर ऐसे स्थान में बनना था, जहां न पर्वत हो, न समतल, न जंगल। वह स्थान दिव्य नदी के तट पर हो। वह स्थल आध्यात्मिक तरंगों से पूर्ण ऐतिहासिक महत्व का भी हो। उनकी शिष्या श्रीश्री माधवी मां ने इस काम को पूरा किया। सपने में श्रीश्री माधवी मां को इस स्थान का चित्र दिखा, जो पूर्णागिरि पीठ के आंचल में शारदा नदी के तट पर टनकपुर में ब्रह्मदेव (बूम) गांव में था। यहां ब्रह्मजी ने महाकामेश्वरी की साधना और यज्ञ किया था। इसी जगह पर देवराज इंद्र ने भी महाभगवती की आराधना की थी। पीठ निर्माण के लिए 1012 यंत्रों को प्राण प्रतिष्ठित किया गया था। नौ नवंबर 1997 में अध्यात्म, साधना के इस महत्वपूर्ण केंद्र की नींव पड़ी। वर्ष 2003 में मंदिर का निर्माण पूरा हुआ।
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