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उत्तराखंड के पहले चुनाव में हारी बाजी जीती थी कांग्रेस
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चंपावत। ट्वेंटी-20 क्रिकेट मैच का आगाज भले ही वर्ष 2005 में हुआ हो लेकिन उत्तराखंड राज्य बनने के सवा साल बाद 14 फरवरी 2002 को हुए चुनाव भी क्रिकेट के इसी संस्करण के अंदाज में हुए थे। पहली बार विधानसभा सीट बनी चंपावत का नतीजा क्रिकेट की आखिरी गेंद की तरह आखिरी चक्र पर आया। तब भारी बगावत के बावजूद कांग्रेस ने हारी बाजी जीती थी। मतगणना के हर चरण में बुरी तरह पिछड़ी कांग्रेस ने आखिरी चरण में जीत हासिल कर इतिहास रचा था।
चंपावत सीट पर हुए पहले चुनाव में सबसे ज्यादा 14 प्रत्याशी चुनाव मैदान में थे। तब कांग्रेस, भाजपा, सपा, बसपा, उक्रांद के अलावा नौ निर्दलीय प्रत्याशियों ने पर्चे भरे थे। इन निर्दलियों में कांग्रेस के दो बागी उम्मीदवार भी थे। अंत में विजेता रहे कांग्रेस प्रत्याशी हेमेश खर्कवाल (8380) को टक्कर देने वाले निर्दलीय प्रत्याशी भी तत्कालीन जिला पंचायत अध्यक्ष मदन सिंह महराना (7985) थे।
कुल 14 चरणों तक चली मतगणना में महराना पहले 13 चरणों तक लगातार बढ़त बनाए रहे। आखिरी चरण से पहले तक वे कांग्रेस से 569 मतों से आगे थे। अंत में सिर्फ 2816 मतों की गिनती बाकी थी। 14वें और निर्णायक चरण में महराना सिर्फ 156 वोट ला सके। भाजपा के हयात सिंह माहर को 470, कांग्रेस की एक अन्य बागी प्रत्याशी विमला सजवाण 624 वोट मिले लेकिन इन सबसे ज्यादा 1120 मत लाकर कांग्रेस के हेमेश खर्कवाल ने 395 वोटों की निर्णायक बढ़त से चुनाव जीतकर तब सबसे कम उम्र का विधायक होने का भी रिकॉर्ड बनाया था। दूसरे नंबर पर रहे महराना को 7985, तीसरे नंबर पर भाजपा को 7743, निर्दलीय विमला सजवाण 6346 वोट मिले। चंपावत के पहाड़ी क्षेत्र में निर्दलीय महराना का डंका बजा लेकिन मैदानी क्षेत्र टनकपुर और बनबसा ने पहाड़ की हवा निकाल दी।
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सिर्फ 21 प्रतिशत वोट मिले थे विजेता को
चंपावत। चंपावत विधानसभा सीट पर हुए पहले चुनाव में चंपावत सीट में 70647 मतदाता थे। इनमें से महज 38893 (54.87 प्रतिशत) वोट पड़े। कुल 14 उम्मीदवारों की मौजूदगी में विजयी प्रत्याशी को कुल पड़े वोटों में से सिर्फ 21.54 प्रतिशत (8380) वोट मिले। यह संख्या कुल मतदाताओं के सापेक्ष महज 11.86 प्रतिशत थी।
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चंपावत सीट पर हुए पहले चुनाव में सबसे ज्यादा 14 प्रत्याशी चुनाव मैदान में थे। तब कांग्रेस, भाजपा, सपा, बसपा, उक्रांद के अलावा नौ निर्दलीय प्रत्याशियों ने पर्चे भरे थे। इन निर्दलियों में कांग्रेस के दो बागी उम्मीदवार भी थे। अंत में विजेता रहे कांग्रेस प्रत्याशी हेमेश खर्कवाल (8380) को टक्कर देने वाले निर्दलीय प्रत्याशी भी तत्कालीन जिला पंचायत अध्यक्ष मदन सिंह महराना (7985) थे।
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कुल 14 चरणों तक चली मतगणना में महराना पहले 13 चरणों तक लगातार बढ़त बनाए रहे। आखिरी चरण से पहले तक वे कांग्रेस से 569 मतों से आगे थे। अंत में सिर्फ 2816 मतों की गिनती बाकी थी। 14वें और निर्णायक चरण में महराना सिर्फ 156 वोट ला सके। भाजपा के हयात सिंह माहर को 470, कांग्रेस की एक अन्य बागी प्रत्याशी विमला सजवाण 624 वोट मिले लेकिन इन सबसे ज्यादा 1120 मत लाकर कांग्रेस के हेमेश खर्कवाल ने 395 वोटों की निर्णायक बढ़त से चुनाव जीतकर तब सबसे कम उम्र का विधायक होने का भी रिकॉर्ड बनाया था। दूसरे नंबर पर रहे महराना को 7985, तीसरे नंबर पर भाजपा को 7743, निर्दलीय विमला सजवाण 6346 वोट मिले। चंपावत के पहाड़ी क्षेत्र में निर्दलीय महराना का डंका बजा लेकिन मैदानी क्षेत्र टनकपुर और बनबसा ने पहाड़ की हवा निकाल दी।
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सिर्फ 21 प्रतिशत वोट मिले थे विजेता को
चंपावत। चंपावत विधानसभा सीट पर हुए पहले चुनाव में चंपावत सीट में 70647 मतदाता थे। इनमें से महज 38893 (54.87 प्रतिशत) वोट पड़े। कुल 14 उम्मीदवारों की मौजूदगी में विजयी प्रत्याशी को कुल पड़े वोटों में से सिर्फ 21.54 प्रतिशत (8380) वोट मिले। यह संख्या कुल मतदाताओं के सापेक्ष महज 11.86 प्रतिशत थी।