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बेबाकी से बोलीं महिलाएं, इंसाफ में देरी होना भी है नाइंसाफी

Haldwani Bureau हल्द्वानी ब्यूरो
Updated Thu, 06 Feb 2020 10:36 PM IST
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amar ujala samvad
चंपावत के वन स्टॉप सेंटर में अमर उजाला संवाद में चर्चा करती अधिवक्ता और महिला विशेषज्ञ। - फोटो : CHAMPAWAT
16 दिसंबर 2012 की तारीख तो याद है ना आपको। देश के इतिहास में ये दिन काला दिन के रूप में दर्ज है। इस तारीख को बीते पूरे सात साल एक माह और 20 दिन हो चुके हैं मगर निर्भया के साथ गैंग रेप कर उसको मार डालने वाले दरिंदे आज भी अपने गुनाहों की सजा नहीं पा सके हैं। ऐसा न होना देश के सुस्त गति से चल रहे सिस्टम पर सवाल उठाता है। यह कहना है कि बुधवार को वन स्टॉप सेंटर में हुए अमर उजाला संवाद कार्यक्रम में विशेषज्ञ महिलाओं का।
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उनका कहना है कि तय समयसीमा के भीतर इंसाफ न होना, दरअसल नाइंसाफी है। तीलू रौतेली पुरस्कार विजेता रीता गहतोड़ी ने कविता से अपनी बता शुरू की-नहीं इस बाजार की वस्तु नहीं हूं मैं, मुझे खरीदा या बेचा नहीं जा सकता कभी, गुलामी किसी हालत में कबूल नहीं करती मैं। क्यो उलझाते हो मुझे क्षणिक तुच्छ भौतिक सुखों की चाह दिखाकर, क्यों देते हो पैसे या रंगीन महफिलों का प्रलोभन, नहीं चाहिए मुझे फालतू बनावट भरे जीवन का लालच।
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न्याय व्यवस्था में सुधार की जरूरत
निर्भया के गुनाहगारों को कई अरब देशों की तरह तत्काल और लोगों के बीच सजा दी जानी चाहिए थी। इससे सबक लेते हुए न्याय व्यवस्था में सुधार की जरूरत है। प्रेरणा अधिकारी।
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सिस्टम को बेहतर करना जरूरी
निर्भया जैसी वारदातों को रोकने के लिए सिस्टम को बेहतर करना तो जरूरी है ही, साथ ही परिवार लड़कियों को ही नहीं लड़कों को भी संस्कार दिए जाने चाहिए। शालिनी देवी।
कानून में जरूरी संशोधन करें
सिस्टम के छेद का फायदा उठा निर्भया के दोषी फांसी को आगे खिसकाते जा रहे हैं। इस खामी को दूर कर दुराचार के कसूरवारों को तुरंत फांसी देने के लिए कानूनों में जरूरी संशोधन किए जाने चाहिए। सोनी, प्रभारी, वन स्टॉप सेंटर।
धाराओं में समय के साथ बदलाव की जरूरत
आईपीसी और सीआरपीसी की धाराओं में समय के साथ बदलाव की जरूरत है। आरोप पत्र दाखिल करने की अवधि डेढ़ माह से कम कर 15 दिन की जानी चाहिए। साक्ष्यों को एकत्र करने का तरीका भी वैज्ञानिक हो।
एडवोकेट ऋतु सिंह।
बच्चों को लड़कियों की गरिमा की सीख दें
घर से शुरुआत कर माता-पिता अपने बच्चों को बहिन और लड़कियों की गरिमा की सीख दें। साथ ही सिस्टम ऐसा हो, जिसमें आरोपियों के बच निकलने की संभावना बिल्कुल भी न हो। तनुजा।
संविधान में संशोधन की जरूरत
हमारी कानूनी धाराएं डेढ़ सौ साल पुरानी है। दुराचार जैसी जघन्य वारदातों को रोकने के लिए कानून व संविधान में जरूरी संशोधन वक्त की मांग है। संसद को इस पर गौर करना चाहिए। एडवोकेट सविता कोठारी।
मुठभेड़ में मारना गलत नहीं
बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ की थीम तभी पूरी हो सकेगी, जब वहशियों से वे बच सकें। निर्भया की मां और परिजनों को न्याय पाने के लिए मानसिक यंत्रणा झेलनी पड़ रही है। ऐसे प्रकरणों में अपराधियों को मुठभेड़ में मारना भी गलत नहीं है। मीनू पंत, प्रभारी, निर्भया प्रकोष्ठ।
सियासी संरक्षण बिल्कुल न दें
अपराधियों को सियासी संरक्षण बिल्कुल भी न मिले और नहीं ऐसे मसलों में किसी तरह की राजनीति हो। फास्ट ट्रैक कोर्ट में दुष्कर्म जैसे जघन्य मामलों का तीन माह के भीतर निस्तारण हो। कमला।
बचाव के तरीकों का प्रशिक्षण दें
निर्भया प्रकरण से सीख लेने की जरूरत है। सिस्टम अपना काम करेगा, मगर हर लड़की को दरिंदों से आत्म रक्षा के लिए बचाव के तरीकों का प्रशिक्षण भी देना होगा। निर्मला, सुरक्षा कर्मी।

गुनाहगारों को तयशुदा समय पर फांसी दें
निर्भया के गुनाहरगारों को तयशुदा वक्त पर फांसी देकर सरकार उदाहरण स्थापित कर सकती थी। साथ ही दूसरे दरिंदों को नसीहत भी दे सकती थी। पर वह ऐसा करने में नाकाम रही। रीता गहतोड़ी, तीलू रौतेली पुरस्कार विजेता।
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