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छोटे इलाके की बड़ी वीरगाथा : 1971 के भारत-पाक युद्ध में चंपावत के 12 सैनिकों ने दी शहादत
Sat, 15 Dec 2018 10:40 PM IST
kamlesh kamlesh
अमर उजाला ब्यूरो, लोहाघाट (चंपावत)।
अमर उजाला ब्यूरो, लोहाघाट (चंपावत)।
Published by: kamlesh kamlesh
Updated Sat, 15 Dec 2018 10:40 PM IST
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कै.एनके पुनेठा
- फोटो : AMAR UJALA
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पाक के खिलाफ 1971 के युद्ध में छोटे जिले चंपावत के जांबाजों का बड़ा योगदान रहा। युद्ध में इलाके के 12 जवान अपने प्राणों का बलिदान देकर वीरगति को प्राप्त हुए। जनकांडे के रहने वाले कैप्टन शहीद उमेद सिंह माहरा ने शहीद होने से पूर्व शत्रुओं के काफिले पर हमला कर अपनी फौज को भारी नुकसान से बचाया था।
अदम्य शौर्य और साहस का परिचय देकर दुश्मन सेना के दांत खट्टे करते हुए वीरगति को प्राप्त होने के बाद उन्हें मरणोपरांत अशोक चक्र से नवाजा गया। जिला पूर्व सैनिक कल्याण अधिकारी दरबान सिंह गुसांई ने बताया कि 1971 के भारत-पाक युद्ध में यहां के 12 जवानों ने शहादत दी। युद्ध के गवाह रहे कैप्टन पीएस देव और कैप्टन एनके पुनेठा बताते हैं कि पूर्वी सीमा पर इस इलाके के सैनिकों ने भी बहादुरी से मोर्चा संभाल विजय पथ को आगे बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई।
1971 युद्ध के चंपावत जिले के 12 शहीद:
जनकांडे के कैप्टन उमेद सिंह माहरा, कुनेड़ा के ज्वाला दत्त, सौजबुंगा के हवलदार केदार दत्त, मुडिय़ानी के सिपाही प्रहलाद सिंह, चामी के जोत सिंह, कलीगांव के प्रताप सिंह, तल्ली छंदा के शिवराज सिंह, कमेला के केशव दत्त, मल्लाकोट के नायक मान सिंह, मेदीढेक के गंगा सिंह, भाटीगांव के रेवाधर और बंगुली के हरीश चंद्र।
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पाक के मंसूबों का मुंहतोड़ जवाब दिया और विजय हासिल की
1971 के भारत-पाक युद्ध के गवाह रहे पूर्व सैनिक कैप्टन एनके पुनेठा को अब भी वो दिन याद हैं। कहते हैं कि चार दिसंबर 1971 को भारत पर थोपे इस युद्ध को पाक सैन्य शासक याहिया खां ने जेहाद का नाम दिया था मगर भारतीय सेना ने पाक के मंसूबों का मुंहतोड़ जवाब दिया और विजय हासिल की।
1971 के युद्ध के दौरान भारतीय नौ सेना ने पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान के संपर्क को काट दिया था। इससे पाक की स्थिति कमजोर हो गई। वायु सैनिकों ने पाक के अहम ठिकानों को ध्वस्त कर दिया। छह दिसंबर को भारत ने बांग्लादेश को प्रजातांत्रिक देश के रूप में मान्यता दे दी।
पुनेठा बताते हैं कि भारतीय सेना शकरगढ़ की ओर बढ़ते हुए दक्षिणी सेना के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल जीबी बेबूर के नेतृत्व में सिंध प्रांत में 95 किमी तक आगे बढ़ गई। सेना ने पाक के साढ़े चार हजार वर्ग मील क्षेत्र पर कब्जा कर लिया। कराची बंदरगाह पर नौसेना ने पाक के खैबर और शांहजाहां के अलावा तीन अन्य जहाजों को डुबा दिया था। कराची बंदरगाह, तेल रिफायनरियों को भी आग के हवाले कर दिया गया।
हमारे जांबाज सैनिकों ने पाकिस्तान को अमेरिका से मिली पनडुब्बी को भी डुबा दिया। विक्रांत ने चटगांव बंदरगाह पर भारी बम वर्षा की। इस बीच अमेरिका ने अपने सातवें बेड़े को बंगाल की खाड़ी में उतार दिया। दस दिसंबर को बांग्लादेश में तैनात कमांडरों में लेफ्टिनेंट जनरल जेएस अरोरा को संयुक्त कमान का कमांडर बनाया गया।
सेनाध्यक्ष ने पाक सेना को आत्म समर्पण करने का संदेश भिजवाया। 14 दिसंबर को पाक के गवर्नर हाउस में वायु सेना ने राकेट दागे। 15 दिसंबर की शाम पांच बजे बांग्लादेश के खिलाफ हवाई कार्रवाई रोक दी गई। 16 दिसंबर को ढाका के रेसकोर्स मैदान में पाक सेना के 93 हजार सैनिकों ने समर्पण किया।
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अदम्य शौर्य और साहस का परिचय देकर दुश्मन सेना के दांत खट्टे करते हुए वीरगति को प्राप्त होने के बाद उन्हें मरणोपरांत अशोक चक्र से नवाजा गया। जिला पूर्व सैनिक कल्याण अधिकारी दरबान सिंह गुसांई ने बताया कि 1971 के भारत-पाक युद्ध में यहां के 12 जवानों ने शहादत दी। युद्ध के गवाह रहे कैप्टन पीएस देव और कैप्टन एनके पुनेठा बताते हैं कि पूर्वी सीमा पर इस इलाके के सैनिकों ने भी बहादुरी से मोर्चा संभाल विजय पथ को आगे बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई।
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1971 युद्ध के चंपावत जिले के 12 शहीद:
जनकांडे के कैप्टन उमेद सिंह माहरा, कुनेड़ा के ज्वाला दत्त, सौजबुंगा के हवलदार केदार दत्त, मुडिय़ानी के सिपाही प्रहलाद सिंह, चामी के जोत सिंह, कलीगांव के प्रताप सिंह, तल्ली छंदा के शिवराज सिंह, कमेला के केशव दत्त, मल्लाकोट के नायक मान सिंह, मेदीढेक के गंगा सिंह, भाटीगांव के रेवाधर और बंगुली के हरीश चंद्र।
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पाक के मंसूबों का मुंहतोड़ जवाब दिया और विजय हासिल की
1971 के भारत-पाक युद्ध के गवाह रहे पूर्व सैनिक कैप्टन एनके पुनेठा को अब भी वो दिन याद हैं। कहते हैं कि चार दिसंबर 1971 को भारत पर थोपे इस युद्ध को पाक सैन्य शासक याहिया खां ने जेहाद का नाम दिया था मगर भारतीय सेना ने पाक के मंसूबों का मुंहतोड़ जवाब दिया और विजय हासिल की।
1971 के युद्ध के दौरान भारतीय नौ सेना ने पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान के संपर्क को काट दिया था। इससे पाक की स्थिति कमजोर हो गई। वायु सैनिकों ने पाक के अहम ठिकानों को ध्वस्त कर दिया। छह दिसंबर को भारत ने बांग्लादेश को प्रजातांत्रिक देश के रूप में मान्यता दे दी।
पुनेठा बताते हैं कि भारतीय सेना शकरगढ़ की ओर बढ़ते हुए दक्षिणी सेना के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल जीबी बेबूर के नेतृत्व में सिंध प्रांत में 95 किमी तक आगे बढ़ गई। सेना ने पाक के साढ़े चार हजार वर्ग मील क्षेत्र पर कब्जा कर लिया। कराची बंदरगाह पर नौसेना ने पाक के खैबर और शांहजाहां के अलावा तीन अन्य जहाजों को डुबा दिया था। कराची बंदरगाह, तेल रिफायनरियों को भी आग के हवाले कर दिया गया।
हमारे जांबाज सैनिकों ने पाकिस्तान को अमेरिका से मिली पनडुब्बी को भी डुबा दिया। विक्रांत ने चटगांव बंदरगाह पर भारी बम वर्षा की। इस बीच अमेरिका ने अपने सातवें बेड़े को बंगाल की खाड़ी में उतार दिया। दस दिसंबर को बांग्लादेश में तैनात कमांडरों में लेफ्टिनेंट जनरल जेएस अरोरा को संयुक्त कमान का कमांडर बनाया गया।
सेनाध्यक्ष ने पाक सेना को आत्म समर्पण करने का संदेश भिजवाया। 14 दिसंबर को पाक के गवर्नर हाउस में वायु सेना ने राकेट दागे। 15 दिसंबर की शाम पांच बजे बांग्लादेश के खिलाफ हवाई कार्रवाई रोक दी गई। 16 दिसंबर को ढाका के रेसकोर्स मैदान में पाक सेना के 93 हजार सैनिकों ने समर्पण किया।