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सिलपाटा में पशुबलि के लिए लाए भैंसा
ब्यूरो/अमर उजाला, चमोली।
Updated Fri, 06 Jan 2017 09:19 PM IST
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Dancing gods and crowd Pswa
- फोटो : अमर उजाला
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पशु बलि पर जहां रोक लग चुकी है वहीं सिलपाटा गांव में शुक्रवार को देवी की पूजा के बाद बलि के लिए भैंसा लाया गया। सूचना पर प्रशासन की टीम पहुंची और ग्रामीणों से वार्ता की। इसके बाद ग्रामीणों ने बलि के लिए लाए भैंसे को प्रशासन को सौंप दिया। वहीं ढमकर गांव में देवी की पूजा के दौरान पशु बलि न देकर श्रीफल से ही पूजा की गई।
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सिलपाटा गांव में सात दिनों से ईष्ट मां भगवती के मंदिर परिसर में देवी की पूजा की जा रही थी। शुक्रवार को अष्टमी पर अंतिम दिन पूजा के बाद यहां बलि के लिए ग्रामीण भैंसा लेकर आ गए। बीस साल पहले यहां बलि पर रोक लगा दी गई थी लेकिन रोक के बाद भी ग्रामीण बलि के लिए भैंसा ले आए।
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पशु बलि की सूचना मिलने पर प्रशासन सिलपाटा गांव पहुंचा। तहसीलदार सुशीला कोठियाल और राजस्व उपनिरीक्षक एसपी डिमरी ने बलि न देने को लेकर ग्रामीणों के साथ वार्ता की। इस पर ग्रामीणों ने देवी पूजा के बाद भैंसा प्रशासन को सौंपने की बात कही। पूजा के बाद ग्रामीणों ने बलि के लिए लाया भैंसा प्रशासन को सौंप दिया। इस दौरान पुलिस चौकी प्रभारी प्रेम सिंह भंडारी और राजस्व उपनिरीक्षक करीम बख्श मौजूद रहे।
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वहीं आदिबदरी तहसील के ढमकर गांव में श्रीफल और सीताफल चढ़ाकर पूजा की गई। यहां 17 साल पहले कई भैंसों की बलि देवी पूजा के दौरान दी जाती थी, लेकिन वर्ष 2012 के बाद ग्रामीणों ने पशु बलि बंद कर श्रीफल से पूजा की। पांच साल बाद हुए कार्यक्रम में ग्रामीणों ने श्रीफल परंपरा को कायम रखा।
इस दौरान गांव में भारी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। इस दौरान देवी की धुनी पूजा के साथ ही अस्त्र-शस्त्रों की पूजा की गई। देवताओं के पश्वा अवतरित हुए और ढोल दमाऊं सहित बाजे भंकोंरों की धुन पर देवनृत्य हुआ। ग्राम प्रधान त्रिलोक सिंह ने बताया कि गांव में वर्ष 2012 में पूजा हुई तो ग्रामीणों ने पशु बलि छोड़कर श्रीफल की बलि दी।
इस बार भी यही परंपरा को दोहराया गया। इस अवसर पर पदम सिंह, भरत रावत, पुष्कर रावत सहित आदिबदरी, जैम, थापली, नगली और तलसारी आदि गांवों के ग्रामीण मौजूद थे।