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Bageshwar News: निचली अदालत से मिली दोषमुक्ति के खिलाफ राज्य सरकार की अपील सत्र न्यायालय से भी खारिज
Tue, 07 Jul 2026 12:39 AM IST
हल्द्वानी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बागेश्वर
संवाद न्यूज एजेंसी, बागेश्वर
Updated Tue, 07 Jul 2026 12:39 AM IST
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बागेश्वर। न्यायालय सत्र न्यायाधीश ने गरुड़ तहसील के अमस्यारी गांव से जुड़े एक मारपीट और गालीगलौज के मामले में राज्य सरकार की ओर से दायर फौजदारी अपील को खारिज कर दिया है।
मामले के अनुसार अमस्यारी निवासी पूरन चंद्र जोशी ने बैजनाथ थाने में तहरीर देकर आरोप लगाया था कि 26 जून 2024 की शाम ज्योति देवी और उनके बेटे उमेश जोशी ने आवारा पशु को उनकी गोशाला की तरफ हांकने का विरोध करने पर उनकी माता शांति देवी के साथ दराती और डंडों से गंभीर मारपीट की।
पुलिस ने इस मामले में प्राथमिकी दर्ज कर आरोप पत्र कोर्ट में पेश किया था लेकिन विचारण के बाद निचली अदालत ने साक्ष्यों के अभाव और विरोधाभासों को देखते हुए 29 जनवरी 2026 को आरोपियों को बरी कर दिया था। निचली अदालत के इसी फैसले के खिलाफ जिला मजिस्ट्रेट के माध्यम से राज्य सरकार ने सत्र न्यायालय में अपील दायर की थी। सत्र न्यायालय ने पत्रावली और गवाहों के बयानों का गहन अनुश्रवण करने के बाद पाया कि घटना 26 जून की बताई गई थी जबकि पुलिस को तहरीर दो दिन बाद 28 जून को दी गई जिसका वादी पक्ष कोई स्पष्टीकरण नहीं दे सका। इसके अलावा गवाहों के बयानों में भारी विरोधाभास देखने को मिला।
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वादी ने कोर्ट में यह भी स्वीकार किया कि उनका आरोपियों से पुराना विवाद और रंजिश चल रही है जबकि घटना के वक्त आरोपियों की तरफ से भी बैजनाथ थाने में क्रॉस एनसीआर दर्ज कराई गई थी। अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ लगे आरोपों को युक्तियुक्त संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा है और रंजिश के चलते तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश किए जाने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। इसी के आधार पर सत्र न्यायाधीश पंकज तोमर ने राज्य सरकार की अपील को निरस्त करते हुए आरोपियों की दोषमुक्ति के आदेश की पुष्टि कर दी।
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मामले के अनुसार अमस्यारी निवासी पूरन चंद्र जोशी ने बैजनाथ थाने में तहरीर देकर आरोप लगाया था कि 26 जून 2024 की शाम ज्योति देवी और उनके बेटे उमेश जोशी ने आवारा पशु को उनकी गोशाला की तरफ हांकने का विरोध करने पर उनकी माता शांति देवी के साथ दराती और डंडों से गंभीर मारपीट की।
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पुलिस ने इस मामले में प्राथमिकी दर्ज कर आरोप पत्र कोर्ट में पेश किया था लेकिन विचारण के बाद निचली अदालत ने साक्ष्यों के अभाव और विरोधाभासों को देखते हुए 29 जनवरी 2026 को आरोपियों को बरी कर दिया था। निचली अदालत के इसी फैसले के खिलाफ जिला मजिस्ट्रेट के माध्यम से राज्य सरकार ने सत्र न्यायालय में अपील दायर की थी। सत्र न्यायालय ने पत्रावली और गवाहों के बयानों का गहन अनुश्रवण करने के बाद पाया कि घटना 26 जून की बताई गई थी जबकि पुलिस को तहरीर दो दिन बाद 28 जून को दी गई जिसका वादी पक्ष कोई स्पष्टीकरण नहीं दे सका। इसके अलावा गवाहों के बयानों में भारी विरोधाभास देखने को मिला।
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वादी ने कोर्ट में यह भी स्वीकार किया कि उनका आरोपियों से पुराना विवाद और रंजिश चल रही है जबकि घटना के वक्त आरोपियों की तरफ से भी बैजनाथ थाने में क्रॉस एनसीआर दर्ज कराई गई थी। अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ लगे आरोपों को युक्तियुक्त संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा है और रंजिश के चलते तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश किए जाने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। इसी के आधार पर सत्र न्यायाधीश पंकज तोमर ने राज्य सरकार की अपील को निरस्त करते हुए आरोपियों की दोषमुक्ति के आदेश की पुष्टि कर दी।