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बागनाथ, बैजनाथ जैसे धाम, पिंडारी जैसा ग्लेशियर पर्यटन विकास को और क्या चाहिए--
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बागेश्वर की थाती:पवित्र सरयू नदी का उद्गमस्थल सहस्त्रधारा। संवाद न्यूज एजेंसी
- फोटो : BAGESHWAR
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बागेश्वर। बागनाथ, बैजनाथ जैसे पौराणिक धाम, पिंडारी, कफनी, सुंदरढूंगा जैसे ग्लेशियर, ट्रेल जैसा दर्रा, पवित्र सरयू नदी का उद्गमस्थल सहस्त्रधारा यह सब बागेश्वर की थाती हैं। पर्यटन विकास के लिए इससे बेहतर और क्या हो सकता है लेकिन नीति नियंताओं को इन धामों, ग्लेशियरों, सहस्त्रधारा में पर्यटन की संभावना शायद नहीं दिखाई देती। यही कारण है कि जिला गठन के 25 साल बीतने के बाद भी बागेश्वर में धार्मिक और साहसिक को पंख नहीं लग सके हैं।
बागेश्वर में बागनाथ, बैजनाथ धाम के साथ ही पौराणिक महत्व के धार्मिक स्थलों की भरमार है। कोट भ्रामरी, बदियाकोट का आदि बद्री धाम, भद्रकाली, कांडा का महाकाली मंदिर, धौलीनाग जैसे धाम यहां की पहचान हैं। कत्यूरी शासनकाल में बने बागनाथ, बैजनाथ धाम स्थापत्य कला के बेजोड़ नमूने हैं। वास्तुकला की दृष्टि से महत्वपूर्ण मंदिरों को पुरातत्व और संस्कृति विभाग ने अपने संरक्षण में लिया है लेकिन धार्मिक, साहसिक पर्यटन की अपार संभावना के बाद भी पर्यटन नहीं बढ़ पा रहा है।
हिमालय से निकलने वाली सरयू गंगा का उद्गमस्थल भी जिले में है। सरमूल, सहस्त्रधारा नाम से विख्यात सरयू के उद्गमस्थल के दीदार के लिए वर्षभर श्रद्धालु, सैलानी आते हैं लेकिन खराब सड़क और बदहाल ट्रैकिंग रूट श्रद्धालुओं, सैलानियों की राह कठिन कर देते हैं। सवाल यही है कि हुक्मरानों की नजर इन धार्मिक, साहसिक पर्यटन स्थलों पर कब पड़ेगी?
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पर्यटनमंत्री की घोषणा नहीं चढ़ी परवान
बागेश्वर। प्रदेश के पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज ने पिछले कार्यकाल में सहस्त्रधारा, भद्रतुंगा, शिखर मूल नारायण मंदिर आदि स्थलों को पर्यटन सर्किट से जोड़कर विकसित करने की घोषणा की थी। पर्यटन विकास की यह फाइल अभी प्रस्ताव तैयार करने तक ही सीमित है। पर्यटन विकास से स्थानीय लोगों का विकास भी स्वत: हो जाता लेकिन सरकार और नेताओं को यह समझाए कौन?
पिंडारी ट्रैकिंग रूट वर्ष 2013 की आपदा के बाद से बदहाल
बागेश्वर। जिले में साहसिक खेलों की भी अपार संभावना है। पिंडारी ग्लेशियर की ट्रैकिंग पर हर साल बड़ी संख्या में देश, विदेश से ट्रैकर पहुंचते हैं। ट्रैकिंग रूट वर्ष 2013 की आपदा के बाद से बहदाल है। बड़ी जद्दोजहद के बाद इस साल द्वाली नामक स्थान पर झूलापुल बन सका है। द्वाली में कई सौ मीटर ट्रैकिंग रूट नौ साल से ध्वस्त है। जिले की नदियों में राफ्टिंग, मत्स्य आखेट की भी बड़ी संभावनाएं हैं। नदियों का उपयोग भी साहसिक पर्यटन के लिए नहीं हो पा रहा है।
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बागेश्वर में बागनाथ, बैजनाथ धाम के साथ ही पौराणिक महत्व के धार्मिक स्थलों की भरमार है। कोट भ्रामरी, बदियाकोट का आदि बद्री धाम, भद्रकाली, कांडा का महाकाली मंदिर, धौलीनाग जैसे धाम यहां की पहचान हैं। कत्यूरी शासनकाल में बने बागनाथ, बैजनाथ धाम स्थापत्य कला के बेजोड़ नमूने हैं। वास्तुकला की दृष्टि से महत्वपूर्ण मंदिरों को पुरातत्व और संस्कृति विभाग ने अपने संरक्षण में लिया है लेकिन धार्मिक, साहसिक पर्यटन की अपार संभावना के बाद भी पर्यटन नहीं बढ़ पा रहा है।
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हिमालय से निकलने वाली सरयू गंगा का उद्गमस्थल भी जिले में है। सरमूल, सहस्त्रधारा नाम से विख्यात सरयू के उद्गमस्थल के दीदार के लिए वर्षभर श्रद्धालु, सैलानी आते हैं लेकिन खराब सड़क और बदहाल ट्रैकिंग रूट श्रद्धालुओं, सैलानियों की राह कठिन कर देते हैं। सवाल यही है कि हुक्मरानों की नजर इन धार्मिक, साहसिक पर्यटन स्थलों पर कब पड़ेगी?
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पर्यटनमंत्री की घोषणा नहीं चढ़ी परवान
बागेश्वर। प्रदेश के पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज ने पिछले कार्यकाल में सहस्त्रधारा, भद्रतुंगा, शिखर मूल नारायण मंदिर आदि स्थलों को पर्यटन सर्किट से जोड़कर विकसित करने की घोषणा की थी। पर्यटन विकास की यह फाइल अभी प्रस्ताव तैयार करने तक ही सीमित है। पर्यटन विकास से स्थानीय लोगों का विकास भी स्वत: हो जाता लेकिन सरकार और नेताओं को यह समझाए कौन?
पिंडारी ट्रैकिंग रूट वर्ष 2013 की आपदा के बाद से बदहाल
बागेश्वर। जिले में साहसिक खेलों की भी अपार संभावना है। पिंडारी ग्लेशियर की ट्रैकिंग पर हर साल बड़ी संख्या में देश, विदेश से ट्रैकर पहुंचते हैं। ट्रैकिंग रूट वर्ष 2013 की आपदा के बाद से बहदाल है। बड़ी जद्दोजहद के बाद इस साल द्वाली नामक स्थान पर झूलापुल बन सका है। द्वाली में कई सौ मीटर ट्रैकिंग रूट नौ साल से ध्वस्त है। जिले की नदियों में राफ्टिंग, मत्स्य आखेट की भी बड़ी संभावनाएं हैं। नदियों का उपयोग भी साहसिक पर्यटन के लिए नहीं हो पा रहा है।