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कहीं धूप सेंकने को तो बलि नहीं दे दी गई!
अल्मोड़ा़, अमर उजाला ब्यूरो
Updated Mon, 18 Sep 2017 10:42 PM IST
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कटा तना बता रहा है पेड़ खोखला नहीं था।
- फोटो : अमर उजाला
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वन विभाग के अधिकारियों ने अपने विभागीय परिसर में स्थित देवदार के जिस पेड़ को खतरा बताकर धराशायी कर दिया उस पेड़ की जड़ें खराब नहीं थीं और यह पेड़ खोखला भी नहीं था। मौके पर कटे हुए तने और पेड़ के जड़ वाले हिस्से को देखकर खतरा होने की बात किसी के गले नहीं उतर रही है। बल्कि इस आशंका को बल मिल रहा है कि कहीं धूप सेंकने के लिए तो इस हरे-भरे निर्दोष देवदार की बलि तो नहीं दे दी गई।
बता दें कि अब से कुछ साल पहले भी वन विभाग के अधिकारी ऐसा ही कारनामा कर चुके हैं जब अल्मोड़ा में वन संरक्षक के बंगले में धूप रोक रहे देवदार के दो पेड़ काट दिए गए थे। तब इस मामले ने काफी तूल पकड़ा था। वन विभाग के जिस परिसर में देवदार का यह भारी भरकम पेड़ स्थित था उस परिसर में अल्मोड़ा वन प्रभाग और सिविल सोयम वन प्रभाग के दफ्तर हैं और यहां दो डीएफओ बैठते हैं। इसी परिसर में पीछे की तरफ वन कर्मियों की कॉलोनी है।
वन विभाग के अधिकारियों का दावा है कि देवदार का यह पेड़ कालोनीवासियों के लिए खतरा बना हुआ था और पेड़ भीतर से खोखला हो चुका था, लेकिन दूसरी तरफ पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि पेड़ पूरी तरह दुरुस्त था। मौके पर कटा हुआ तना इस बात की गवाही दे रहा है कि वह भीतर से खोखला नहीं था और न ही पेड़ की जड़ें खराब थीं।
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इसे देखते हुए लोगों की इस आशंका को बल मिल रहा है कि यह हरा भरा पेड़ जाड़ों में कालोनीवासियों की धूप रोक रहा था शायद इसी कारण इसकी बलि दे दी गई। लोगों को वन विभाग के अफसरों की समझ पर भी तरस आ रहा है क्योंकि उन्होंने देवदार को गिराने का वह दिन चुना जब देश भर में प्रधानमंत्री मोदी के जन्म दिन पर स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण के कार्य किए जा रहे थे।
यह भी उल्लेखनीय है कि वन विभाग के अधिकारी इस तरह का काम कुछ साल पहले भी कर चुके हैं, जब यहां धार की तूनी में स्थित वन संरक्षक के बंगले में धूप रोकने वाले देवदार के दो पेड़ सरेआम गिरा दिए गए। तब इस मामले ने काफी तूल भी पकड़ा था और इस प्रकरण की जांच भी हुई, लेकिन बाद में पूरे मामले में लीपापोती कर दी गई थी।
उत्तर प्रदेश के जमाने में तो ऐसे मामले भी सामने आए थे जब उस दौर के वन विभाग के कुछ उच्चाधिकारियों और अल्मोड़ा के एक-दो जिलाधिकारियों ने जागेश्वर क्षेत्र की देवदार की लकड़ी से फर्नीचर आदि बनवाकर लखनऊ में अपने बंगलों तक पहुंचा दिया था। लोगों का मानना है कि खतरे के नाम पर पेड़ काटने के मामलों में धांधली और कई वास्तविक प्रकरणों में लोगों को अनुमति नहीं मिलने की शिकायतों को देखते हुए इन मामलों में अफसरों की संयुक्त कमेटी बननी चाहिए। जिसमें प्रशासन के अधिकारी और कुछ अन्य जानकार भी शामिल किए जाएं।
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बता दें कि अब से कुछ साल पहले भी वन विभाग के अधिकारी ऐसा ही कारनामा कर चुके हैं जब अल्मोड़ा में वन संरक्षक के बंगले में धूप रोक रहे देवदार के दो पेड़ काट दिए गए थे। तब इस मामले ने काफी तूल पकड़ा था। वन विभाग के जिस परिसर में देवदार का यह भारी भरकम पेड़ स्थित था उस परिसर में अल्मोड़ा वन प्रभाग और सिविल सोयम वन प्रभाग के दफ्तर हैं और यहां दो डीएफओ बैठते हैं। इसी परिसर में पीछे की तरफ वन कर्मियों की कॉलोनी है।
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वन विभाग के अधिकारियों का दावा है कि देवदार का यह पेड़ कालोनीवासियों के लिए खतरा बना हुआ था और पेड़ भीतर से खोखला हो चुका था, लेकिन दूसरी तरफ पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि पेड़ पूरी तरह दुरुस्त था। मौके पर कटा हुआ तना इस बात की गवाही दे रहा है कि वह भीतर से खोखला नहीं था और न ही पेड़ की जड़ें खराब थीं।
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इसे देखते हुए लोगों की इस आशंका को बल मिल रहा है कि यह हरा भरा पेड़ जाड़ों में कालोनीवासियों की धूप रोक रहा था शायद इसी कारण इसकी बलि दे दी गई। लोगों को वन विभाग के अफसरों की समझ पर भी तरस आ रहा है क्योंकि उन्होंने देवदार को गिराने का वह दिन चुना जब देश भर में प्रधानमंत्री मोदी के जन्म दिन पर स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण के कार्य किए जा रहे थे।
यह भी उल्लेखनीय है कि वन विभाग के अधिकारी इस तरह का काम कुछ साल पहले भी कर चुके हैं, जब यहां धार की तूनी में स्थित वन संरक्षक के बंगले में धूप रोकने वाले देवदार के दो पेड़ सरेआम गिरा दिए गए। तब इस मामले ने काफी तूल भी पकड़ा था और इस प्रकरण की जांच भी हुई, लेकिन बाद में पूरे मामले में लीपापोती कर दी गई थी।
उत्तर प्रदेश के जमाने में तो ऐसे मामले भी सामने आए थे जब उस दौर के वन विभाग के कुछ उच्चाधिकारियों और अल्मोड़ा के एक-दो जिलाधिकारियों ने जागेश्वर क्षेत्र की देवदार की लकड़ी से फर्नीचर आदि बनवाकर लखनऊ में अपने बंगलों तक पहुंचा दिया था। लोगों का मानना है कि खतरे के नाम पर पेड़ काटने के मामलों में धांधली और कई वास्तविक प्रकरणों में लोगों को अनुमति नहीं मिलने की शिकायतों को देखते हुए इन मामलों में अफसरों की संयुक्त कमेटी बननी चाहिए। जिसमें प्रशासन के अधिकारी और कुछ अन्य जानकार भी शामिल किए जाएं।