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Almora News: परमवीर चक्र मेजर सोमनाथ की तर्ज पर परमवीर चक्र विजेता मेजर शैतान सिंह ने भी बढ़ाया केआरसी का मान
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शहीद मेजर शैतान सिंह
- फोटो : RANIKHET
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रानीखेत (अल्मोड़ा)। कुमाऊं रेजीमेंट की वीरगाथा और रानीखेत का नाम फिर सुर्खियों में है। नवंबर 1962 में चीन के साथ लड़ाई में कुमाऊं रेजीमेंट के मेजर शैतान सिंह ने 17 हजार फीट ऊंचे चुसूल सेक्टर के रेजांग्ला में भारी बर्फबारी के बीच दुश्मनों का बहादुरी के साथ मुकाबला किया था। दुश्मन से लड़ते हुए उन्होंने वीरगति प्राप्त की थी। अंडमान के एक द्वीप का नामकरण उनके नाम से होने के बाद रानीखेत और कुमाऊं रेजीमेंट सेंटर (केआरसी) की शान फिर बढ़ी है।
एक दिसंबर 1924 को जोधपुर राजस्थान के बंसार गांव में लेफ्टिनेंट कर्नल हेम सिंह के घर पैदा हुए मेजर शैतान सिंह ने एक अगस्त 1941 को कमीशन प्राप्त किया और कुमाऊं रेजीमेंट में नियुक्ति प्राप्त की। वर्ष 1962 में चीन ने उत्तरी सीमाओं पर आक्रमण कर दिया। मेजर शैतान सिंह 17,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित रेजांग्ला में इन्फेंट्री बटालियन की एक कंपनी का नेतृत्व कर रहे थे।
एक नवंबर 1962 को चीन की सेना ने भारी मोर्टार तोपों और छोटे हथियारों से इस कंपनी पर गोलाबारी शुरू कर दी। कुमाऊं रेजीमेंट की कंपनी में 120 लोग तैनात थे, जबकि दुश्मनों की संख्या काफी अधिक थी। इसके बावजूद भारतीय सेना ने कई दुश्मनों को मार गिराया।
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जवानों का मनोबल बढ़ाने के लिए मेजर शैतान सिंह एक पोस्ट से दूसरी पोस्ट पर निर्भीक होकर दौड़ते रहे और खुद गोलाबारी करते हुए साथियों को हौसला देते रहे। इसी बीच उनके कंधे और पेट में गोलियां लग गई। लगातार खून बहता रहा मगर वह अंतिम समय तक लड़ते रहे।
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एक दिसंबर 1924 को जोधपुर राजस्थान के बंसार गांव में लेफ्टिनेंट कर्नल हेम सिंह के घर पैदा हुए मेजर शैतान सिंह ने एक अगस्त 1941 को कमीशन प्राप्त किया और कुमाऊं रेजीमेंट में नियुक्ति प्राप्त की। वर्ष 1962 में चीन ने उत्तरी सीमाओं पर आक्रमण कर दिया। मेजर शैतान सिंह 17,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित रेजांग्ला में इन्फेंट्री बटालियन की एक कंपनी का नेतृत्व कर रहे थे।
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एक नवंबर 1962 को चीन की सेना ने भारी मोर्टार तोपों और छोटे हथियारों से इस कंपनी पर गोलाबारी शुरू कर दी। कुमाऊं रेजीमेंट की कंपनी में 120 लोग तैनात थे, जबकि दुश्मनों की संख्या काफी अधिक थी। इसके बावजूद भारतीय सेना ने कई दुश्मनों को मार गिराया।
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जवानों का मनोबल बढ़ाने के लिए मेजर शैतान सिंह एक पोस्ट से दूसरी पोस्ट पर निर्भीक होकर दौड़ते रहे और खुद गोलाबारी करते हुए साथियों को हौसला देते रहे। इसी बीच उनके कंधे और पेट में गोलियां लग गई। लगातार खून बहता रहा मगर वह अंतिम समय तक लड़ते रहे।