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जिले के गांवों में आज भी ओखली में तैयार किए जाते हैं च्यूड़े

Haldwani Bureau हल्द्वानी ब्यूरो
Updated Tue, 25 Oct 2022 11:30 PM IST
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Even today in the villages of the district, chews are prepared in Okhli.
भैया दूज के लिए अल्मोड़ा के चौकुना मे च्यूड़े कूटतीं महिलाएं।।संवाद - फोटो : ALMORA
अल्मोड़ा। मशीनीकरण के युग में रेडीमेड च्यूड़े का प्रचलन बढ़ गया है। जिले के कुछ गांवों में आज भी ओखली में च्यूड़े तैयार करने की परंपरा कायम है। नई पीढ़ी रेडीमेड च्यूड़े को पसंद कर रही है। भैया दूज के लिए कई लोगों ने रेडीमेड च्यूड़ों की खरीदारी की।
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दिवाली पर्व के बाद भैयादूज पर्व के लिए गांव-गांव में ओखली में च्यूड़े कूटे जाते थे। कई गांवों में सामूहिक रूप से भी च्यूड़े कूटे जाते थे। इससे दिवाली की रौनक भी ज्यादा बढ़ जाती थी। च्यूड़े सिरोधारण कराने की प्राचीन परंपरा है। मशीनीकरण ने सदियों पुरानी च्यूड़े कूटने की परंपरा को भी प्रभावित किया है। समय बदलने के साथ ही गांवों में रेडीमेड च्यूड़े पहुंचने लगे हैं। अभी कुछ गांवों में ओखली में च्यूड़े कूटने की परंपरा जारी है। शहरी क्षेत्रों में लोगों ने खुद च्यूड़े कूटने की परंपरा को लगभग त्याग ही दिया है। भैयादूज पर्व के लिए मंगलवार को गांवों में सामूहिक रूप से च्यूड़े कूटे गए। इससे गांवों में सुबह से ही रौनक रही।
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इंसेट
ओखली में कूटे च्यूड़े माने जाते है शुभ
अल्मोड़ा। ओखली में कूट कर तैयार किए जाने वाले च्यूड़े शुभ माने जाते हैं। भैयादूज पर्व पर बहिनें अपने भाइयों को च्यूड़ा सिरोधारण कराएंगी। विवाहित महिलाएं भैयादूज पर अपने मायके जाकर भाइयों को च्यूड़े पूजती हैं। भाई बहनों को बदले में गिफ्ट आदि देते हैं।
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प्रवासी भी साथ ले जाते हैं च्यूड़े
अल्मोड़ा। कार्तिक माह में शुभ मुहूर्त पर विशेष नक्षत्र में सूखे धानों को एक बाल्टी पानी या टब में आठ-दस दिन पहले भिगो दिया जाता है। धान के अच्छे से भीगने के बाद बाल्टी का पानी फेंक दिया जाता है। भीगे धान को बड़े तवे या परात में चूल्हे पर खूब भूना जाता है। फिर इन्हें ओखली में कूटा जाता है। दिवाली में घर आए प्रवासी लोग भी च्यूड़े साथ ले जाते हैं।
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क्या कहती हैं महिलाए
अब गांवों में भी बदलाव की बयार है। मशीनीकरण के चलते नई पीढ़ी के लोग ज्यादा कष्ट नहीं उठाना चाहते हैं। हाथ से च्यूड़े कूटने में काफी मेहनत लगती है। पुराने समय में च्यूड़े कूटने को लेकर महिलाओं में उत्साह रहता था। अब पुरानी पीढ़ी के लोग भी गिने चुने हैं और नई पीढ़ी के लोग इसे समय की बर्बादी समझते हैं।
बुजुर्ग आमा जीवंती देवी
बाजारीकरण के दौर में च्यूड़े कूटने की परंपरा पर भी प्रभाव पड़ा है। हाथ से च्यूड़े कूटने की परंपरा भी पुरानी पीढ़ी के लोगों तक सिमट कर रह गई है। हाथ से च्यूड़े तैयार करने में काफी मेहनत लगती है। इसलिए नई पीढ़ी इससे विमुख होकर रेडीमेड च्यूड़ों की ही खरीदारी करते हैं।

बसंती देवी, चौकुना (अल्मोड़ा)
हाथ से तैयार च्यूड़े शुद्ध, ताजा होने के साथ ही पौष्टिता से भी भरपूर होते हैं। ओखली में च्यूड़े कूटने के दौरान महिलाएं सुख-दुख की बातें भी साझा करती हैं। इसके बावजूद नई पीढ़ी के लोग इसका महत्व नहीं समझ रहे हैं।
नीला देवी, चौकुना (अल्मोड़ा)
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