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विकास के लिए बांध बनें पर हिमालय का विनाश न हो
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो, अल्मोड़ा।
Updated Sun, 10 Apr 2016 12:50 AM IST
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संरक्षण के साथ हो विकास
- फोटो : अमर उजाला
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अल्मोड़ा। प्रसिद्ध पर्यावरणविद और पर्यावरण केंद्र नई दिल्ली की महानिदेशक डॉ. सुनीता नारायण ने कहा कि विकास के लिए बांध बनने चाहिए, लेकिन इनका निर्माण इस तरह से हो कि हिमालय का विनाश न हो। अधिक संख्या में छोटे बांधों का निर्माण बड़े बांधों की तरह ही खतरनाक है। राज्य सरकारें धड़ल्ले से छोटे बांध बनाने की अनुमति दे रही हैं जो कि ठीक नहीं है। बांधों में बनने वाली बिजली पर पहला अधिकार वहां के ग्रामीणों का होना चाहिए, लेकिन हिमाचल को छोड़कर अन्य राज्य ऐसा नहीं कर रहे हैं। उन्होंने कहा जल, जंगल, जमीन पर स्थानीय लोगों की भागीदारी से ही पर्यावरण बच सकेगा। उन्होंने यमुना नदी की हालत पर भी चिंता जताई और नदियों के आसपास बसासत रोकने की वकालत की।
उत्तराखंड सेवा निधि पर्यावरण शिक्षा संस्थान में सप्तम बीडी पांडे स्मृति व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए डॉ. सुनीता नारायण ने यह बात कही। उन्होंने कहा कि राज्य सरकारों को 25 मेगावाट बिजली पैदा करने वाले बांधों के निर्माण की अनुमति देने का अधिकार है। इसका फायदा उठाते हुए राज्य सरकारें धड़ाधड़ बांध बनाने की अनुमति दे रही हैं जो कि खतरनाक है। बांध निर्माण से बनने वाली बिजली पर पहला अधिकार क्षेत्र के ग्रामीणों का होना चाहिए लेकिन हिमाचल प्रदेश को छोड़कर ज्यादातर राज्य छोटे बांधों में बनने वाली बिजली भी ग्रिड को दे देते हैं। उन्होंने कहा कि पर्यावरण बचाने के लिए आम लोगों की भागीदारी जरूरी है। जंगल और इंसान के रिश्ते जोड़कर रखने जरूरी होंगे, तभी इनका संरक्षण होगा।
लोगों को जंगलों का लाभ नहीं मिला तो लोग वनों को बचाने के लिए भी आगे नहीं आएंगे। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते राज्य वित्त आयोग के अध्यक्ष डॉ. बीके जोशी ने कहा कि प्राकृतिक संसाधनों का कितना और किस रूप में दोहन किया जाए इसके लिए कुछ न कुछ नीति बनानी होगी। उत्तराखंड सेवा निधि के निदेशक पद्मश्री डॉ. ललित पांडे ने मुख्य अतिथि सहित सभी लोगों का आभार जताया। इस मौके पर जाने माने पत्रकार सुमन दुबे, जमना लाल बजाज पुरस्कार विजेता राधा बहन, देव मुखर्जी, सुशील दुबे, पालिकाध्यक्ष प्रकाश चंद्र जोशी, वरिष्ठ पत्रकार पीसी जोशी, स्वतंत्रता सेनानी देवेंद्र सनवाल, प्रो. मोहन दुर्गापाल, ईश्वर जोशी, प्रो. जेएस रावत, प्रो. शेखर जोशी, डॉ. जेसी दुर्गापाल, डॉ. वीडीएस नेगी, पीसी तिवारी, शेखर लख्चौरा, किशोर जोशी, केसी लोहनी, कमल जोशी, जंगबहादुर थापा, पूरन चंद्र तिवारी आदि मौजूद थे।
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अल्मोड़ा। प्रसिद्ध पर्यावरणविद डॉ. सुनीता नारायण ने कहा कि बंदरों ने पहाड़ को तबाह कर दिया है और बंदरों को पकड़ने, नसबंदी कराने जैसे प्रयोग विफल रहे हैं। अब नुकसान पहुंचाने वाले बंदरों को मारना ही सही विकल्प साबित हो सकता है। हमें इन्हें हनुमान के बजाय बालि का रूप समझना पड़ेगा। वर्ना अमीरों के क्षेत्र से बंदरों को पकड़कर गरीबों के इलाकों में छोड़ने की परंपरा चलती रहेगी। उन्होंने यह भी कहा कि वन्यजीव विहार पर्यटन के लिए इस्तेमाल हो रहे हैं, लेकिन इन क्षेत्रों से गरीबों को निकाला जा रहा है जो उचित नहीं है।
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उत्तराखंड सेवा निधि पर्यावरण शिक्षा संस्थान में सप्तम बीडी पांडे स्मृति व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए डॉ. सुनीता नारायण ने यह बात कही। उन्होंने कहा कि राज्य सरकारों को 25 मेगावाट बिजली पैदा करने वाले बांधों के निर्माण की अनुमति देने का अधिकार है। इसका फायदा उठाते हुए राज्य सरकारें धड़ाधड़ बांध बनाने की अनुमति दे रही हैं जो कि खतरनाक है। बांध निर्माण से बनने वाली बिजली पर पहला अधिकार क्षेत्र के ग्रामीणों का होना चाहिए लेकिन हिमाचल प्रदेश को छोड़कर ज्यादातर राज्य छोटे बांधों में बनने वाली बिजली भी ग्रिड को दे देते हैं। उन्होंने कहा कि पर्यावरण बचाने के लिए आम लोगों की भागीदारी जरूरी है। जंगल और इंसान के रिश्ते जोड़कर रखने जरूरी होंगे, तभी इनका संरक्षण होगा।
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लोगों को जंगलों का लाभ नहीं मिला तो लोग वनों को बचाने के लिए भी आगे नहीं आएंगे। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते राज्य वित्त आयोग के अध्यक्ष डॉ. बीके जोशी ने कहा कि प्राकृतिक संसाधनों का कितना और किस रूप में दोहन किया जाए इसके लिए कुछ न कुछ नीति बनानी होगी। उत्तराखंड सेवा निधि के निदेशक पद्मश्री डॉ. ललित पांडे ने मुख्य अतिथि सहित सभी लोगों का आभार जताया। इस मौके पर जाने माने पत्रकार सुमन दुबे, जमना लाल बजाज पुरस्कार विजेता राधा बहन, देव मुखर्जी, सुशील दुबे, पालिकाध्यक्ष प्रकाश चंद्र जोशी, वरिष्ठ पत्रकार पीसी जोशी, स्वतंत्रता सेनानी देवेंद्र सनवाल, प्रो. मोहन दुर्गापाल, ईश्वर जोशी, प्रो. जेएस रावत, प्रो. शेखर जोशी, डॉ. जेसी दुर्गापाल, डॉ. वीडीएस नेगी, पीसी तिवारी, शेखर लख्चौरा, किशोर जोशी, केसी लोहनी, कमल जोशी, जंगबहादुर थापा, पूरन चंद्र तिवारी आदि मौजूद थे।
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अल्मोड़ा। प्रसिद्ध पर्यावरणविद डॉ. सुनीता नारायण ने कहा कि बंदरों ने पहाड़ को तबाह कर दिया है और बंदरों को पकड़ने, नसबंदी कराने जैसे प्रयोग विफल रहे हैं। अब नुकसान पहुंचाने वाले बंदरों को मारना ही सही विकल्प साबित हो सकता है। हमें इन्हें हनुमान के बजाय बालि का रूप समझना पड़ेगा। वर्ना अमीरों के क्षेत्र से बंदरों को पकड़कर गरीबों के इलाकों में छोड़ने की परंपरा चलती रहेगी। उन्होंने यह भी कहा कि वन्यजीव विहार पर्यटन के लिए इस्तेमाल हो रहे हैं, लेकिन इन क्षेत्रों से गरीबों को निकाला जा रहा है जो उचित नहीं है।