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Almora News: पारंपरिक फसलों पर पड़ रही जलवायु परिवर्तन की मार, खेती के तौर तरीके पर बदलाव की जरूरत

Thu, 06 Nov 2025 11:39 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, अल्मोड़ा
संवाद न्यूज एजेंसी, अल्मोड़ा Updated Thu, 06 Nov 2025 11:39 PM IST
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Climate change is affecting traditional crops, requiring changes in farming practices.
बागेश्वर। जलवायु परिवर्तन किसान और पशुपालकों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। गर्मी के सीजन में बारिश, सर्दियों में बारिश और बर्फबारी के समय इसका नहीं होना जैसे हालात खेती और पशुपालन को सीधे प्रभावित कर रहे हैं। मौसम के इस प्रभाव से हो रहे नुकसान को बचाने में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की जलवायु अनुकूल कृषि पर राष्ट्रीय नवाचार (निकरा) परियोजना मददगार हो सकती है। कृषि विज्ञान केंद्र काफलीगैर किसानों को खेती और पशुपालन के तौर तरीकों में बदलाव को प्रेरित कर रहा है।
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जिले में जलवायु परिवर्तन का सबसे अधिक असर सर्दियों में दिख रहा है। पिछले आठ-दस वर्षों में जाड़े के दिनों में होने वाली बारिश का अनुपात घट गया है। इससे फसल, सब्जी, फल और पशुपालन का काम प्रभावित हो रहा है। पारंपरिक तौर पर होने वाली फसलें अब लुप्त होती जा रही हैं। दुधारू पशुओं के दूध देने की क्षमता कम हो रही है। मुर्गियों की मृत्यु दर में बढ़ोतरी होने से भी नुकसान होता है। इन समस्याओं से जूझ रहे किसानों को कृषि विज्ञान केंद्र निकरा परियोजना के तहत खेती और पशुपालन में बदलाव के लिए जागरूक कर रहा है।
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पारंपरिक बीजों की जगह उन्नत बीज से होगा लाभ
कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन का अधिक प्रभाव रबी की फसल पर हो रहा है। जिले में पहले बोये जाने वाला पारंपरिक गेहूं और काला मसूर का उत्पादन करीब खत्म हो गया है। रमाड़ी के संतरा को भी मौसम के बदलाव की मार झेलनी पड़ी है। केंद्र के विषय विशेषज्ञ हरीश चंद्र जोशी बताते हैं कि किसानों को पारंपरिक गेहूं के स्थान पर वीएल 967, 907, मसूर की वीएल 126, 133, 148 और पंत 08, पंत 09 प्रजाति के उत्पादन के लिए प्रेरित किया जा रहा है। मडुवा की खेती अधिक करने के लिए भी जागरूक किया जा रहा है। मुर्गियों की मृत्यु दर कम करने के लिए उन्नत किस्म का चारा कारगर है। गायों को ठंड से बचाने के लिए रबर काऊ मैट और दूध की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए मिनरल मिक्चर और हरे के अधिक प्रयोग पर जोर दिया जा रहा है।
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