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अल्मोड़ा में 90 साल पुरानी है रावण परिवार के पुतले बनाने की परंपरा
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो, अल्मोड़ा।
Updated Mon, 10 Oct 2016 11:32 PM IST
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अल्मोड़ा में कलाकार द्वारा बनाया गया रावण परिवार के एक सदस्य का पुतला। एक सदस्य का पुतला।
- फोटो : अमर उजाला
अल्मोड़ा में दशहरा पर्व पर पुतले बनाने की परंपरा करीब 90 साल पुरानी मानी जाती है। शुरू में सिर्फ रावण का ही पुतला बनाया जाता था, लेकिन अब पिछले 20-30 सालों से दशहरा महोत्सव भव्य तरीके से मनाया जाता है। दशहरा पर्व पर इस साल रावण परिवार के 28 पुतले बनाए जा रहे हैं। दशहरे के दिन मंगलवार को नगर में इन पुतलों की शोभा यात्रा निकाली जाएगी। पुतलों की शोभा यात्रा को देखने पूरा नगर उमड़ पड़ता है। उसके बाद रात्रि में रावण परिवार के इन पुतलों को स्थानीय स्टेडियम में जोरदार आतिशबाजी और रंगारंग कार्यक्रमों के बीच इन्हें जला दिया जाता है।
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अल्मोड़ा नगर में पुतले बनाने की परंपरा का स्पष्ट इतिहास नहीं मिलता, लेकिन लक्ष्मी भंडार हुक्का क्लब की पत्रिका पुरवासी में कुछ साल पहले 1930 में बनाए गए रावण के पुतले का फोटो प्रकाशित हुआ था। जिससे यह माना जाता है कि अल्मोड़ा में पुतले बनाने की परंपरा करीब 90 साल पहले अवश्य शुरू हो गई थी। शुरुआत में कुछ सालों तक सिर्फ रावण का पुतला ही बनाया जाता था। उसके बाद करीब 40-50 साल पहले अल्मोड़ा के लाला बाजार, जौहरी मोहल्ला, मल्ली बाजार सहित कुछ जगहों पर पांच-छह पुतले बनने शुरू हुए, लेकिन पिछले करीब 30 साल से पुतलों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। इस साल 28 पुतले बनाए जा रहे हैं। अब बकायदा दशहरा महोत्सव समिति के तहत यह आयोजन होता है। दशहरा महोत्सव समिति के अंतर्गत विभिन्न मोहल्लों की पुतला समितियां समन्वय से पुतलों का निर्माण करती हैं।
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यह भी उल्लेखनीय है कि कुछ मोहल्लों और बाजारों को पहले से ही पुतले आवंटित हैं। लाला बाजार की पुतला समिति रावण, त्रिपुरा सुंदरी अहिरावण, हुक्का क्लब ताड़िका, जौहरी बाजार कुंभकर्ण, थाना बाजार मेघनाद, राजपुरा देवांतक, धारानौला प्रहस्त और चौक बाजार की पुतला समिति अक्षय कुमार का पुतला बनाती है। इसके अलावा अन्य पुतला कमेटियां अलग-अलग राक्षसों के पुतले तैयार करती हैं। कई पुतले आज भी कलात्मकता की दृष्टि से काफी सुंदर बनाए जाते हैं। पुतला कमेटियों से जुड़े स्थानीय कलाकार पुतलों का चेहरा, हाथ, पैर और शरीर की अन्य बनावट पर काफी ध्यान देते हैं ताकि वह सजीव लगें। फिर उन्हें कपड़े, मुकुट आदि पहनाकर भव्य रूप दिया जाता है। वरिष्ठ रंगकर्मी शिवचरण पांडे का कहना है कि हाल के वर्षों में पुतलों की संख्या में इजाफा हुआ है और कई पुतले कलात्मकता की दृष्टि से काफी अच्छे बन रहे हैं। पुतलों की बहुत अधिक संख्या के बजाय इनकी कलात्मकता पर ध्यान दिया जाना चाहिए।
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