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‘दवा’ ही बन गई ‘जहर’
देहरादून/ आफताब अजमत
Updated Mon, 24 Jun 2013 11:33 AM IST
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आपदा के बाद पहाड़ी इलाकों में फंसे लोगों के लिए ‘दवा’ ही ‘जहर’ साबित हो रही है। पेट में उठती भूख की आग को शांत करने के लिए यह लोग जंगल से कोई भी फल-फूल तोड़कर खा लेते हैं, इस बात से अंजान कि यह जड़ी-बूटियां हैं।
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इनमें से कुछ बूटियां तो इतनी खतरनाक हैं कि खाते ही इंसान बेहोशी के आगोश में चला जाता है। कई जड़ी-बूटियां तो ऐसी हैं कि जिनके जख्म से छूते ही पूरे शरीर में जहर फैल जाता है।
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केदारघाटी के ऊछौला बांगर गांव के पूर्व प्रधान ईश्वर सिंह पंवार ने बताया कि स्थानीय ग्रामीण जड़ी-बूटियां खाकर बेहोश हुए कई लोगों की जान बचा चुके हैं। उन्होंने बताया कि कई जड़ी बूटियां ऐसी हैं जिन्हें एक बार छूने और उन्हीं हाथों से कुछ खाने के बाद कम से कम दो घंटे तक बेहोशी की हालत रहती है।
बेहोशी और चक्कर आते हैं
आपदा में घायल हुए यात्री किसी भी पत्ते को चोट पर लगा लेते हैं, लेकिन यह बेहद खतरनाक है। जड़ी बूटी विशेषज्ञ डा. मायाराम उनियाल के मुताबिक पहाड़ में 2800 से 14 हजार फिट की ऊंचाई पर मौजूद आठ से दस बूटियां इन दिनों पुष्पकाल में हैं। इनके बीच ज्यादा देर तक चलने या फिर सुगंध से आदमी को बेहोशी और चक्कर आते हैं। पहाड़ के मौसम के लिहाज से इन दिनों यह बूटियां बेहद खतरनाक होती हैं।
खतरनाक जड़ी-बूटियां
विषकंडार - इसके फूल खिलने का समय 15 जून के बाद होता है। इसकी तेज सुगंध से बेहोशी आती है।
शिमरू/तलि - इसका अंग्रेजी नाम रेभाडांड्रान लेसिगोटम है। इसके पुष्प तेज सुगंध वाले होते हैं।
भुतकेषी - इसके फूल और जड़ दोनों ही सुगंधित होते हैं। इसकी जड़ को छूने भर से सिरदर्द और चक्कर के बाद बेहोशी आ जाती है।
प्लेसट्रेनाम - इसकी सुगंध बेहद तेज होती है। इसके पास से गुजरने वाले व्यक्ति पर 20 मिनट में ही इसका असर दिखने लगता है।
महामारी का डर
ईश्वर सिंह के मुताबिक गौरीगांव और मुनकटिया में आपदा में मारे गए लोगों की लाशें सड़ रही हैं। महामारी फैलने की आशंका के चलते स्थानीय लोग अब यहां से पलायन कर रहे हैं। कई जगहों पर तो अब भी लाशों के अंबार लगे हैं। जल्द कुछ न किया गया तो एक और आपदा का सामना करना पड़ेगा।