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यहां दहशत ने ले ली कई जान...

Sun, 23 Jun 2013 10:11 AM IST
देहरादून/ब्यूरो
देहरादून/ब्यूरो Updated Sun, 23 Jun 2013 10:11 AM IST
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kedarnath destruction

कभी सोचा न था कि ऐसा मंजर भी देखने को मिलेगा। ग्लेशियरों पर अध्ययन के लिए अपर नंदनवन गए थे। 16 जून को वहां से चले। गंगोत्री पहुंचते-पहुंचते आपदा की खबर कानों में आने लगी थी।

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इससे आगे तो बस बर्बादी का नजारा था। सड़कें टूट चुकी थीं। लोग खाने के लिए तरस रहे थे। गंगनाली में लगभग ढाई हजार लोग फंसे थे। न तो प्रशासन का कोई नुमाइंदा था न पुलिस कहीं दिखाई दी। सेना के जवान ही लोगों को बचाते दिखे।
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कुछ लोगों ने दहशत के आलम में जान गंवा दी। दिल के दौरे से तीन लोगों की जान जाते देखी। अफसोस रहा कि किसी को बचा नहीं सके। छह दिन चलते हुए हो गए हैं। 105 किलोमीटर का सफर पूरा कर चुके हैं।
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पैरों में सूजन है। खून निकल रहा है, लेकिन इससे ज्यादा दर्द उस तबाही ने दिया है, जिसके निशां यमुना घाटी में बिखरे पड़े हैं....।

उत्तराखंड आपदा की विशेष कवरेज

यह आप-बीती अमर उजाला से फोन पर साझा की दून की डा. आशा थपलियाल ने, जो इंडियन माउंटेनियरिंग फाउंडेशन (आईएमएफ) के 30 सदस्यीय महिला दल के साथ बीती चार जून को नंदन वन गई थीं। ट्रैकिंग दल के साथ जाने का उनका उद्देश्य पर्यावरण और ग्लेशियरों पर अध्ययन करना था।

आपदा के बाद से वह दल के साथ गंगोत्री में फंसी थीं। हर किसी से संपर्क कट गया था। कोई रास्ता न देख पैदल चलना शुरू कर दिया। छह दिन बाद शनिवार को उत्तरकाशी पहुंच पाईं।


पोंगी गांव से उत्तरकाशी तक पहुंचने में ही लगभग 12 घंटे लग गए। डा. थपलियाल के बकौल गंगोत्री से हर्षिल तक लगभग 89 किलोमीटर के सफर ने जो दर्द दिया, वह जिंदगी में शायद ही कभी भुलाया जा सके।

दुकानदारों ने की वसूली, सीओ की मदद

हर्षिल में हाल यह था कि कई दुकानदारों ने पानी की बोतल तक के लिए 50 रुपये वसूले। सेना के जवान यहां भी मदद को आए। सीओ खुद दुकानदारों से आपदा ग्रस्तों का हवाला देेते हुए पैसा ज्यादा न लेने की बात कहते रहे।

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