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मेले की मौज में सुलझ जाता था मुकदमा
ब्यूूूराो/अमर उजाला संतकबीरनगर
Updated Tue, 08 Mar 2016 12:22 AM IST
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मंिददिर
- फोटो : ambrish mishra
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मेले की मौज में सुलझ जाता था मुकदमा
तामेश्वरनाथ मेले में कभी लोक अदालत भी लगती थी
नक्काशीदार लकड़ी के दरवाजे, केले के लिए मशहूर था मेेला
शोभित कुमार पांडेय
संतकबीरनगर। त्योहारों के इस देश में मेले से जुड़ी तमाम कहानियां आपने सुनीं होंगी, पर किसी मेले में ‘अदालत’ सजने का जिक्र शायद ही सुना होगा। आज हम आपको एक ऐसे मेले में ले जाएंगे, जहां ऐसा लंबे अरसे तक चलता रहा है। तामेश्वरनाथ की धरती पर हर साल शिवरात्रि को लगने वाला मेला कुछ अरसे पहले तक अपनी इसी विशिष्टता के लिए मशहूर था। दूरदराज के गांवों से लोग यहां पहुंचकर न सिर्फ अपने आराध्य के दर्शन-पूजन के बाद मेले का मजा लेते थे, बल्कि यहीं पर लगी अदालत में पहुंचकर न्याय भी पा जाते थे। यादों की जर्द वरक से नगरपालिका के पूर्व ईओ रहे मेला कमेटी के अध्यक्ष प्रहलाद भारती ने आज के दौर में चौंकाने देने वाला मेले का ऐसा ही गौरवशाली इतिहास सुनाया।
बकौल भारती, पहले मेले में एसडीएम की अदालत लगती थी। जिसमें छोटे-मोटे भूमि संबंधी विवाद भी निपटाएं जाते थे। लेकिन पिछले एक दशक से ऐसा नहीं हो रहा। मेला देशी केला, लकड़ी की बल्ली और नक्काशीदार दरवाजे के लिए काफी मशहूर था। करीब 500 बैलगाड़ियां महराजगंज, पीपीगंज आदि जगहों से ये सामान लेकर आती थीं। आधुनिकता की दौड़ में अब इनका क्रेज नहीं रहा, पर केले की बाजार अभी भी लगती है। आज से चार, पांच साल पहले तक यहां तीतर, भेड़, बुलबुल की लड़ाई देखने के लिए मजमा जुटता था। मेले में बैल, बछड़ों का बाजार लगता था, लेकिन बदले दौर में सिर्फ बछिया की बाजार लगती है। हरियाणा, दिल्ली, पंजाब, आगरा, बुंदेलखंड से अच्छी नस्ल की बछिया लाकर लोग 20 से 25 हजार की कीमत में बेचते हैं। पहले यातायात के इतने साधन नहीं थे तो लोग पैदल ही एक दिन पहले यहां आकर रुकते थे। यादें ताजा करते हुए बुजुर्ग फूलचंद्र भारती, ठाकुरदीन भारती, ब्रहमानंद भारती, ओरीराम, अंबरीष भारती और बलदेव भारती ने भी मेले में आए बदलाव पर चर्चा की।
मनोरंजन के थे कई साधन
मनोरंजन के लिए मेले में नौटंकी आती थी। वीडियो का चलन था और पर्दे पर सिनेमा दिखाते थे। अब उसकी जगह डांस पार्टियाें ने ले ली है। मेले में चकला, बेलन, सील लोढ़ा, सूपा, चलनी, हंसिया, खुरपा, कुदाल से लेकर गृहस्थी के हर सामान के साथ महिलाओं के सौंदर्य प्रसाधन की काफी दुकानें लगती हैं।
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कुंए का पानी पीते थे लोग
मेले में 50 से अधिक कुंए थे, जिससे ढेकुल के जरिए मेले में आने वाले लोगों को पानी पिलाने का इंतजाम होता था। अब उसकी जगह नौ इंडिया मार्क टू हैंड और 15 छोटे हैंडपंप लगाए गए है। इसके अलावा नगर पालिका खलीलाबाद और मगहर से पानी का टैंकर आता है।
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तामेश्वरनाथ मेले में कभी लोक अदालत भी लगती थी
नक्काशीदार लकड़ी के दरवाजे, केले के लिए मशहूर था मेेला
शोभित कुमार पांडेय
संतकबीरनगर। त्योहारों के इस देश में मेले से जुड़ी तमाम कहानियां आपने सुनीं होंगी, पर किसी मेले में ‘अदालत’ सजने का जिक्र शायद ही सुना होगा। आज हम आपको एक ऐसे मेले में ले जाएंगे, जहां ऐसा लंबे अरसे तक चलता रहा है। तामेश्वरनाथ की धरती पर हर साल शिवरात्रि को लगने वाला मेला कुछ अरसे पहले तक अपनी इसी विशिष्टता के लिए मशहूर था। दूरदराज के गांवों से लोग यहां पहुंचकर न सिर्फ अपने आराध्य के दर्शन-पूजन के बाद मेले का मजा लेते थे, बल्कि यहीं पर लगी अदालत में पहुंचकर न्याय भी पा जाते थे। यादों की जर्द वरक से नगरपालिका के पूर्व ईओ रहे मेला कमेटी के अध्यक्ष प्रहलाद भारती ने आज के दौर में चौंकाने देने वाला मेले का ऐसा ही गौरवशाली इतिहास सुनाया।
बकौल भारती, पहले मेले में एसडीएम की अदालत लगती थी। जिसमें छोटे-मोटे भूमि संबंधी विवाद भी निपटाएं जाते थे। लेकिन पिछले एक दशक से ऐसा नहीं हो रहा। मेला देशी केला, लकड़ी की बल्ली और नक्काशीदार दरवाजे के लिए काफी मशहूर था। करीब 500 बैलगाड़ियां महराजगंज, पीपीगंज आदि जगहों से ये सामान लेकर आती थीं। आधुनिकता की दौड़ में अब इनका क्रेज नहीं रहा, पर केले की बाजार अभी भी लगती है। आज से चार, पांच साल पहले तक यहां तीतर, भेड़, बुलबुल की लड़ाई देखने के लिए मजमा जुटता था। मेले में बैल, बछड़ों का बाजार लगता था, लेकिन बदले दौर में सिर्फ बछिया की बाजार लगती है। हरियाणा, दिल्ली, पंजाब, आगरा, बुंदेलखंड से अच्छी नस्ल की बछिया लाकर लोग 20 से 25 हजार की कीमत में बेचते हैं। पहले यातायात के इतने साधन नहीं थे तो लोग पैदल ही एक दिन पहले यहां आकर रुकते थे। यादें ताजा करते हुए बुजुर्ग फूलचंद्र भारती, ठाकुरदीन भारती, ब्रहमानंद भारती, ओरीराम, अंबरीष भारती और बलदेव भारती ने भी मेले में आए बदलाव पर चर्चा की।
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मनोरंजन के थे कई साधन
मनोरंजन के लिए मेले में नौटंकी आती थी। वीडियो का चलन था और पर्दे पर सिनेमा दिखाते थे। अब उसकी जगह डांस पार्टियाें ने ले ली है। मेले में चकला, बेलन, सील लोढ़ा, सूपा, चलनी, हंसिया, खुरपा, कुदाल से लेकर गृहस्थी के हर सामान के साथ महिलाओं के सौंदर्य प्रसाधन की काफी दुकानें लगती हैं।
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कुंए का पानी पीते थे लोग
मेले में 50 से अधिक कुंए थे, जिससे ढेकुल के जरिए मेले में आने वाले लोगों को पानी पिलाने का इंतजाम होता था। अब उसकी जगह नौ इंडिया मार्क टू हैंड और 15 छोटे हैंडपंप लगाए गए है। इसके अलावा नगर पालिका खलीलाबाद और मगहर से पानी का टैंकर आता है।