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बंदिशें हटीं तो समाज में छा गईं महिलाएं
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
Updated Tue, 08 Mar 2016 01:29 AM IST
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बंदिशें हटीं तो समाज में छा गईं महिलाएं
प्राचीन काल से लेकर आज तक महिलाओं ने न केवल बदलाव के हर दौर को देखा, जीया और महसूस किया है बल्कि अपनी भूमिका से सभी कालखंडों को प्रभावित भी करती रही हैं। चाहे वह भूमिका घरेलू महिला की रही हो या फिर समाज के मुख्य धारा की। लेकिन पिछले चार दशक में महिलाओं के विकास को लेकर जो बयार बही है, उसकी चर्चा बेहद जरूरी है।
मुझे आज भी याद है महिलाओं को लेकर बंधन का वह दौर, जब घर से निकलने को लेकर तमाम बंदिशें होती थीं। हम पढ़ते तो थे लेकिन घर की जिम्मेदारियों को संभालने के लिए पर आज की पीढ़ी उन तमाम बंदिशों से मुक्त है और पढ़ाई के लिए घर से बाहर का रुख कर चुकी है। मेरा इस बात से पूरा इत्तेफाक है कि यह महिला सशक्तिकरण की दिशा में किए गए प्रयास का ही नतीजा है।
पिछले चार दशक में महिलाओं ने तेजी से रसोई की चौखट से निकल कर समाज को अपनी जरूरत का सिर्फ अहसास ही नहीं कराया बल्कि जरूरत बन गई हैं। इस दौरान उन्होंने जिस दक्षता से पारिवारिक जिम्मेदारियों का निर्वहन किया है, उसी कुशलता से समाज को भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। चाहे सरकारी संस्थान हों या फिर गैर सरकारी, हर कार्यालय में महिलाओं की मौजूदगी इसका जीता-जागता प्रमाण है। लेकिन सशक्तिकरण को लेकर आरक्षण का फार्मूला मेरे गले नहीं उतरता। दरअसल यह आरक्षण महिलाओं की क्षमता को सीमित कर देता है, साथ ही उनके विकास की संभावनाओं पर विराम भी लगाता है। दरअसल व्यवस्थापकों को यह समझना होगा कि महिलाएं अब दया की पात्र नहीं रहीं।
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मैं अपने अनुभव से कह सकती हूं कि पिछले कुछ सालों में महिलाओं का आत्मविश्वास इतना बढ़ा है कि उन्हें किसी आरक्षण की कोई जरूरत नहीं। महिलाओं को उनकी क्षमता पर छोड़ दें, वह अपना मुकाम खुद ब खुद हासिल कर लेंगी। हां, अगर किसी चीज की जरूरत है तो महिलाओं को लेकर सोच बदलने की। मेरे हिसाब से सोच ही वह वजह है, जो आज भी महिलाओं के विकास में बड़ा रोड़ा है। आरक्षण से महिलाओं का अधिकार बढ़ाने वालों से मेरी दरख्वास्त है कि वे अगर कुछ सकते हैं तो सोच बदलने की दिशा में काम करें।
- डॉ. गीता दत्त
अभी जागरूकता पर काम बाकी है
एक महिला डॉक्टर हूं सो मरीज के तौर पर सही, हर दिन कम से सौ से अधिक महिलाओं से मुलाकात तो होती है। इस तजुर्बे से कह सकती हूं कि तमाम प्रयास के बाद भी महिलाओं में जागरूकता की कमी है। दरअसल व्यवस्था का यह प्रयास अभी भी 10 फीसदी महिलाओं तक ही पहुंच सकी है। मेरी नजर में जागरूकता लेकर अभी काफी काम बाकी है।
डॉ. शालिनी गुप्ता, गायनाकॉलजिस्ट
थियेटर से नुक्कड़ तक पहुंची महिलाएं
एक समय था जब थियेटर में काम करने के लिए महिलाओं की तलाश करनी पड़ती थी। सामाजिक बंदिशों ने उनके पांव रोक रखे थे। धीरे-धीरे लोगों ने थिएटर को खुद से जोड़ कर देखना शुरू किया तो महिलाएं भी जुड़ने लगीं। इसी का नतीजा है कि अब महिलाएं नुक्कड़ नाटक में भी दिख रही हैं। मैंने तो बदलाव के इस दौर को बखूबी महसूस किया है।
रीना श्रीवास्तव, रंगकर्मी
अभी चुनौतियां कम नहीं हुईं
बैंक की नौकरी करते एक दशक हो गए। इस दौरान देहात से लेकर शहर की शाखाओं में काम करने का अवसर मिला। इस तजुर्बे से मैं यह कह सकती हूं कि महिला दिवस मनाये जाने की जरूरत अभी लंबे समय तक बनी रहेगी। वजह सोच को लेकर है। महिलाओं और पुरुषों के बीच जो गैप है वह मेरी नजर में अभी कायम है। शहर में तो स्थिति सुधरी है लेकिन देहात में नहीं।
अनीता जेम्स, बैंक मैनेजर
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प्राचीन काल से लेकर आज तक महिलाओं ने न केवल बदलाव के हर दौर को देखा, जीया और महसूस किया है बल्कि अपनी भूमिका से सभी कालखंडों को प्रभावित भी करती रही हैं। चाहे वह भूमिका घरेलू महिला की रही हो या फिर समाज के मुख्य धारा की। लेकिन पिछले चार दशक में महिलाओं के विकास को लेकर जो बयार बही है, उसकी चर्चा बेहद जरूरी है।
मुझे आज भी याद है महिलाओं को लेकर बंधन का वह दौर, जब घर से निकलने को लेकर तमाम बंदिशें होती थीं। हम पढ़ते तो थे लेकिन घर की जिम्मेदारियों को संभालने के लिए पर आज की पीढ़ी उन तमाम बंदिशों से मुक्त है और पढ़ाई के लिए घर से बाहर का रुख कर चुकी है। मेरा इस बात से पूरा इत्तेफाक है कि यह महिला सशक्तिकरण की दिशा में किए गए प्रयास का ही नतीजा है।
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पिछले चार दशक में महिलाओं ने तेजी से रसोई की चौखट से निकल कर समाज को अपनी जरूरत का सिर्फ अहसास ही नहीं कराया बल्कि जरूरत बन गई हैं। इस दौरान उन्होंने जिस दक्षता से पारिवारिक जिम्मेदारियों का निर्वहन किया है, उसी कुशलता से समाज को भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। चाहे सरकारी संस्थान हों या फिर गैर सरकारी, हर कार्यालय में महिलाओं की मौजूदगी इसका जीता-जागता प्रमाण है। लेकिन सशक्तिकरण को लेकर आरक्षण का फार्मूला मेरे गले नहीं उतरता। दरअसल यह आरक्षण महिलाओं की क्षमता को सीमित कर देता है, साथ ही उनके विकास की संभावनाओं पर विराम भी लगाता है। दरअसल व्यवस्थापकों को यह समझना होगा कि महिलाएं अब दया की पात्र नहीं रहीं।
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मैं अपने अनुभव से कह सकती हूं कि पिछले कुछ सालों में महिलाओं का आत्मविश्वास इतना बढ़ा है कि उन्हें किसी आरक्षण की कोई जरूरत नहीं। महिलाओं को उनकी क्षमता पर छोड़ दें, वह अपना मुकाम खुद ब खुद हासिल कर लेंगी। हां, अगर किसी चीज की जरूरत है तो महिलाओं को लेकर सोच बदलने की। मेरे हिसाब से सोच ही वह वजह है, जो आज भी महिलाओं के विकास में बड़ा रोड़ा है। आरक्षण से महिलाओं का अधिकार बढ़ाने वालों से मेरी दरख्वास्त है कि वे अगर कुछ सकते हैं तो सोच बदलने की दिशा में काम करें।
- डॉ. गीता दत्त
अभी जागरूकता पर काम बाकी है
एक महिला डॉक्टर हूं सो मरीज के तौर पर सही, हर दिन कम से सौ से अधिक महिलाओं से मुलाकात तो होती है। इस तजुर्बे से कह सकती हूं कि तमाम प्रयास के बाद भी महिलाओं में जागरूकता की कमी है। दरअसल व्यवस्था का यह प्रयास अभी भी 10 फीसदी महिलाओं तक ही पहुंच सकी है। मेरी नजर में जागरूकता लेकर अभी काफी काम बाकी है।
डॉ. शालिनी गुप्ता, गायनाकॉलजिस्ट
थियेटर से नुक्कड़ तक पहुंची महिलाएं
एक समय था जब थियेटर में काम करने के लिए महिलाओं की तलाश करनी पड़ती थी। सामाजिक बंदिशों ने उनके पांव रोक रखे थे। धीरे-धीरे लोगों ने थिएटर को खुद से जोड़ कर देखना शुरू किया तो महिलाएं भी जुड़ने लगीं। इसी का नतीजा है कि अब महिलाएं नुक्कड़ नाटक में भी दिख रही हैं। मैंने तो बदलाव के इस दौर को बखूबी महसूस किया है।
रीना श्रीवास्तव, रंगकर्मी
अभी चुनौतियां कम नहीं हुईं
बैंक की नौकरी करते एक दशक हो गए। इस दौरान देहात से लेकर शहर की शाखाओं में काम करने का अवसर मिला। इस तजुर्बे से मैं यह कह सकती हूं कि महिला दिवस मनाये जाने की जरूरत अभी लंबे समय तक बनी रहेगी। वजह सोच को लेकर है। महिलाओं और पुरुषों के बीच जो गैप है वह मेरी नजर में अभी कायम है। शहर में तो स्थिति सुधरी है लेकिन देहात में नहीं।
अनीता जेम्स, बैंक मैनेजर